विस्तृत उत्तर
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, किंतु पहले एक बात स्पष्ट करना जरूरी है — भगवान मनुष्यों की तरह 'नाराज' नहीं होते। उनमें वैसा क्रोध नहीं जैसा हममें होता है। किंतु जब हम उनसे दूर जाते हैं — तो उस दूरी के परिणाम अवश्य अनुभव होते हैं।
शास्त्रीय दृष्टि — शास्त्रों में 'दैव-कोप' नहीं, बल्कि 'कर्मफल' की अवधारणा है। जो जैसा करता है, वैसा पाता है। यह नाराजगी नहीं — यह सृष्टि का नियम है।
जब भगवान से दूरी होती है तब ये अनुभव हो सकते हैं:
पूजा में मन नहीं लगना — पूजाघर में जाने की इच्छा न हो, मंत्र बोझ लगने लगें।
मन में बेचैनी और भटकाव — भीतर शांति न हो, छोटी-छोटी बातें परेशान करें।
पाप-कर्मों की ओर झुकाव बढ़ना — झूठ, क्रोध, लोभ, दूसरों को कष्ट देना सहज लगने लगे।
सत्संग और भक्ति से विरक्ति — भजन, कीर्तन, सत्संग बेकार लगें।
कार्यों में अनावश्यक बाधाएँ — सब कुछ ठीक करने पर भी बात न बने।
किंतु यह भी जानें — ये 'भगवान की नाराजगी' नहीं, यह हमारे अपने कर्म और मन की स्थिति का प्रतिबिंब है। भगवान सदा हमें वापस बुलाते हैं। उनका स्वभाव क्षमा और करुणा है।
उपाय — जब ऐसा अनुभव हो तो भगवान के सामने सच्चे मन से पश्चाताप करें। वे माँ की तरह हैं — बच्चा दूर जाए तो माँ दरवाजा बंद नहीं करती।





