विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के पूर्व-खण्ड और विशेषकर उत्तर-खण्ड (प्रेत कल्प) के अनुसार मृत्यु के पश्चात जीवात्मा अपने द्वारा भूलोक में किए गए कर्मों के अनुसार यमराज के लोक की यात्रा करती है और अपने पापों का भयंकर दंड भोगती है। इसके विपरीत पुण्य कर्म करने वाली सात्विक आत्माएं स्वर्लोक या उससे भी उच्च लोकों में जाती हैं। गरुड़ पुराण यह बताता है कि कैसे भूलोक में किए गए सूक्ष्मतम कर्म (दान, यज्ञ, श्राद्ध) परलोक की यात्रा और अगले जन्म को निर्धारित करते हैं। यह भूलोक को चौरासी लाख योनियों की यात्रा के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में स्थापित करता है। जीव चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् जब उसके पाप और पुण्य का संतुलन होता है तब उसे यह दुर्लभ मनुष्य शरीर भारत भूमि पर प्राप्त होता है। स्वर्ग हो या पाताल जीव को अपने पुण्यों या पापों को भोगने के पश्चात् पुनः इसी भूलोक में आना पड़ता है।
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