विस्तृत उत्तर
भूलोक को 'महा-रंगमंच' की संज्ञा देना वैदिक और पौराणिक दर्शन की एक अत्यंत गहरी और समृद्ध रूपक अभिव्यक्ति है। प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों में भूलोक की परिकल्पना मात्र मिट्टी, जल, भौतिक वायु और पर्वतों का एक निर्जीव समूह नहीं है। यह साक्षात् परब्रह्म परमात्मा की अचिन्त्य और अनंत शक्ति द्वारा रचित एक ऐसा महा-रंगमंच है जहाँ अनगिनत जीवात्माएं अपने पूर्व कर्मों का नाटक खेलती हैं। सातों महाद्वीप, सातों महासागर, सुमेरु पर्वत की स्वर्णिम धुरी, जम्बूद्वीप के नव-वर्ष और लोकालोक पर्वत की अभेद्य सीमा — ये सभी उस परम सत्य की महिमा का उद्घोष करते हैं। इस रंगमंच पर देवता, असुर, मनुष्य, पशु — सभी अपने-अपने कर्मों का अभिनय करते हैं। यहाँ दुःख और सुख का वह संतुलित मिश्रण है जो वैराग्य, ज्ञान और परब्रह्म की प्राप्ति की तीव्र इच्छा को जन्म देता है। भूलोक वह पावन तीर्थ है जहाँ देवगण भी जन्म लेने की आकांक्षा करते हैं क्योंकि केवल इसी धरा पर निष्काम कर्म और भगवद्-भक्ति के माध्यम से जीव अपने अज्ञान के बंधनों को काटकर शाश्वत मोक्ष (अपवर्ग) की प्राप्ति कर सकता है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक


