विस्तृत उत्तर
भाग्य और पुरुषार्थ का संबंध परस्पर पूरक है, विरोधी नहीं। हिंदू दर्शन में इन दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह देखा जाता है।
भाग्य वह है जो पूर्व के कर्मों से मिला है — यह हमारे हाथ में नहीं। पुरुषार्थ वह है जो हम अभी कर सकते हैं — यह पूरी तरह हमारे हाथ में है। एक सुंदर उपमा से समझें: चित्रकारी के लिए कागज का आकार और रंग निर्धारित है (यह भाग्य है), परंतु उस पर कौन सा चित्र बनाना है, यह चित्रकार के हाथ में है (यह पुरुषार्थ है)।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा — 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' — अर्थात कर्म करने का अधिकार तुम्हारा है, फल की चिंता मत करो। यह श्लोक स्वयं यह सिद्ध करता है कि श्रीकृष्ण पुरुषार्थ को प्राथमिक महत्व देते हैं।
महाभारत में भी कहा गया है — 'दैवमेव परं केचिद्, कर्म चान्ये प्रचक्षते, दैवं पुरुषकारेण कर्मणा प्रतिहन्यते' — अर्थात भाग्य को पुरुषार्थ और कर्म के द्वारा पराजित किया जा सकता है।
व्यवहारिक रूप से यह ऐसा है — जो बीज हम बो चुके हैं (भाग्य), उसका फल आएगा। परंतु वह फल कितना बड़ा होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमने खाद-पानी कितना डाला (पुरुषार्थ)। दोनों मिलकर ही जीवन को पूर्ण बनाते हैं। भाग्यवादी होकर हाथ पर हाथ रखना शास्त्रसम्मत नहीं है।





