विस्तृत उत्तर
यह प्रश्न — सबसे पुराना, सबसे गहरा, सबसे दर्दनाक प्रश्न है। जब जीवन में एक के बाद एक तकलीफें आएँ और लगे कि भगवान सुन नहीं रहे — तब यही प्रश्न उठता है।
सबसे पहले — यह जानें कि आप अकेले नहीं हैं इस प्रश्न में। अर्जुन ने युद्धभूमि में ऐसा ही अनुभव किया। प्रह्लाद ने पिता की यातनाओं में यही सोचा होगा। द्रौपदी ने भरी सभा में रोते हुए भगवान को पुकारा। कुंती जीवन भर कष्ट झेलती रहीं।
भगवान क्यों नहीं सुनते लगता है:
हमारी अपेक्षा और भगवान की योजना — हम चाहते हैं तत्काल राहत, भगवान की योजना दीर्घकालीन होती है। जैसे एक माँ अपने बच्चे को एंटीबायोटिक का कड़वा इंजेक्शन लगवाती है — बच्चे को लगता है माँ दुश्मन है, पर माँ जानती है यह जरूरी है।
कर्म का नियम — कुछ कष्ट पूर्व कर्मों का फल होते हैं — इन्हें 'भोगना' होता है। भगवान इसे तत्काल नहीं हटाते, किंतु सहने की शक्ति देते हैं।
परीक्षा — प्रह्लाद, नरसी मेहता, मीराबाई — सबको परीक्षाएँ मिलीं। परीक्षा में कसे जाने पर सोना शुद्ध होता है।
भगवान सुनते हैं — लेकिन उनका उत्तर हमेशा वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं। कभी वे 'नहीं' कहते हैं, कभी 'अभी नहीं', कभी 'इससे बेहतर कुछ और'।
इस समय के लिए:
एक दिन एक काम — पूरे जीवन के बोझ को एक साथ न उठाएँ। आज का एक दिन जीएँ।
भगवान से शिकायत करें — उनसे छिपाएँ नहीं। जो दिल में है वो रोते हुए उनके सामने रख दें।
इस बात पर ध्यान दें — क्या अभी भी कुछ है जो ठीक है? श्वास चल रही है, कोई एक प्रियजन साथ है — इस छोटे को देखें। भगवान वहाँ भी हैं।
याद रखें — भगवान के पास देर है, अंधेर नहीं।





