विस्तृत उत्तर
भगवान की कृपा हमेशा धन, वैभव या चमत्कार के रूप में नहीं आती — अक्सर वह बहुत सूक्ष्म और गहरी होती है। शास्त्रों और संत-वचनों में इसके कुछ संकेत बताए गए हैं।
भीतर शांति का अनुभव — जब बाहर कितनी भी उथल-पुथल हो पर भीतर एक अजीब सी स्थिरता बनी रहे — यह भगवान की कृपा का सबसे बड़ा लक्षण है।
सत्संग और शास्त्र की ओर मन खिंचना — जब धर्म, भक्ति, सत्संग और ग्रंथों की ओर मन अपने आप आकर्षित होने लगे — जब भजन-कीर्तन सुनने की इच्छा हो — यह कृपा का संकेत है।
सहज संतोष — जो है उसमें संतोष आने लगे, अनावश्यक इच्छाएँ कम होने लगें — यह कृपा का चिह्न है।
दुर्घटना से बचना — जब आप बड़े संकट से बाल-बाल बचें और बाद में समझें कि वह भगवान की रक्षा थी।
सही समय पर सही मार्गदर्शन — जब आप किसी दोराहे पर हों और अचानक कोई व्यक्ति, किताब या विचार सही दिशा दिखा दे।
दूसरों की सेवा में आनंद — जब दूसरों की मदद करने में सहज आनंद आने लगे, जब हृदय में करुणा और प्रेम बढ़े — यह भगवान की कृपा की सबसे सुंदर निशानी है।
मृत्यु और संसार की क्षणभंगुरता का बोध — जब अनित्य चीजों से वैराग्य और शाश्वत की ओर झुकाव हो।
गीता का वचन — 'तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥' (10.10) — जो प्रेमपूर्वक निरंतर भजते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धि देता हूँ जिससे वे मुझे पा सकते हैं — यही कृपा है।





