विस्तृत उत्तर
शुकदेवजी को बड़ा योगी इसलिए माना गया है कि उन्हें समदर्शी, भेदभावरहित और निरंतर परमात्मा में स्थित बताया गया है। वे संसार-निद्रा से जागे हुए थे और बाहरी रूप से मूढ़ जैसे प्रतीत होते थे, क्योंकि वे अपने को छिपाकर रहते थे। उनकी शुद्ध दृष्टि का उदाहरण दिया गया है: स्नान करती स्त्रियाँ नग्न शुकदेवजी को देखकर लज्जित नहीं हुईं, पर वस्त्र पहने हुए व्यासजी को देखकर कपड़े पहन लिए। उन्होंने कहा कि व्यासजी की दृष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद है, पर शुकदेवजी की दृष्टि में यह भेद नहीं। आगे शौनकजी कहते हैं कि वे गृहस्थों के घर उतनी ही देर रुकते हैं जितनी देर में एक गाय दुही जाती है, वह भी घर को तीर्थ बनाने के लिए। यह वैराग्य, समता और आत्मस्थिति उन्हें महान योगी सिद्ध करती है।
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