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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवत 1.4, श्लोक 4-8⏱ 1 मिनट पठन

शुकदेव जी इतने बड़े योगी क्यों माने जाते हैं?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

वे समदर्शी, भेदभावरहित, परमात्मा में स्थित और इतनी विरक्त दृष्टि वाले थे कि स्त्री-पुरुष भेद भी नहीं देखते थे।

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विस्तृत उत्तर

शुकदेवजी को बड़ा योगी इसलिए माना गया है कि उन्हें समदर्शी, भेदभावरहित और निरंतर परमात्मा में स्थित बताया गया है। वे संसार-निद्रा से जागे हुए थे और बाहरी रूप से मूढ़ जैसे प्रतीत होते थे, क्योंकि वे अपने को छिपाकर रहते थे। उनकी शुद्ध दृष्टि का उदाहरण दिया गया है: स्नान करती स्त्रियाँ नग्न शुकदेवजी को देखकर लज्जित नहीं हुईं, पर वस्त्र पहने हुए व्यासजी को देखकर कपड़े पहन लिए। उन्होंने कहा कि व्यासजी की दृष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद है, पर शुकदेवजी की दृष्टि में यह भेद नहीं। आगे शौनकजी कहते हैं कि वे गृहस्थों के घर उतनी ही देर रुकते हैं जितनी देर में एक गाय दुही जाती है, वह भी घर को तीर्थ बनाने के लिए। यह वैराग्य, समता और आत्मस्थिति उन्हें महान योगी सिद्ध करती है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवत 1.4, श्लोक 4-8
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

शुकदेव जी इतने बड़े योगी क्यों माने जाते हैं को संदर्भ सहित समझें

शुकदेव जी इतने बड़े योगी क्यों माने जाते हैं का सबसे सीधा सार यह है: वे समदर्शी, भेदभावरहित, परमात्मा में स्थित और इतनी विरक्त दृष्टि वाले थे कि स्त्री-पुरुष भेद भी नहीं देखते थे।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवत 1.4, श्लोक 4-8 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवत 1.4, श्लोक 4-8 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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