विस्तृत उत्तर
भीष्म पितामह को मोक्ष कृष्ण-स्मरण, कृष्ण-ध्यान और कृष्ण-समर्पण से मिला। उन्होंने पहले कहा कि भगवत्परायण योगी मन को भगवान में लगाकर और वाणी से उनके नाम का कीर्तन करते हुए शरीर छोड़ता है तो कामना और कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है। उत्तरायण आने पर भीष्म ने वाणी रोक दी, मन को सामने खड़े कृष्ण में लगा दिया और दृष्टि को उनके रूप पर स्थिर कर दिया। कृष्ण-दर्शन से उनकी शारीरिक पीड़ा दूर हुई और विशुद्ध कृष्ण-धारणा से शेष अशुभ मिट गया। उन्होंने इंद्रियों की वृत्तियाँ रोककर कृष्ण की स्तुति की। अंत में वे भेद-मोह से मुक्त होकर कृष्ण को प्राप्त हुए और मन, वाणी तथा दृष्टि से स्वयं को कृष्ण में लीन कर दिया।
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