विस्तृत उत्तर
कुंती की प्रार्थना सामान्य अर्थ में दुख मांगने जैसी लगती है, लेकिन उसका कारण भक्ति से जुड़ा है। वह पहले याद करती है कि कृष्ण ने देवकी को कंस से बचाया और उसे तथा उसके पुत्रों को अनेक संकटों से बार-बार बचाया। वह विष, लाक्षागृह की आग, हिडिंब आदि राक्षसों, द्यूतसभा, वनवास की कठिनाइयों, अनेक युद्धों के महारथियों के शस्त्रों और अभी-अभी अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से रक्षा का स्मरण करती है। इसके बाद वह कहती है कि हमारे जीवन में पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि विपत्तियों में निश्चित रूप से कृष्ण का दर्शन होता है। और कृष्ण के दर्शन के बाद फिर जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं आना पड़ता।
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