विस्तृत उत्तर
भीष्म पितामह ने मृत्यु के समय श्रीकृष्ण का ध्यान किया। उत्तरायण आने पर उन्होंने वाणी को रोक दिया और मन को सब ओर से हटाकर सामने खड़े आदिपुरुष कृष्ण में स्थिर कर दिया। कृष्ण पीतांबरधारी चतुर्भुज रूप में उनके सामने थे। भीष्म की आँखें उसी रूप पर एकटक लग गईं। शस्त्रों की चोट से होने वाली पीड़ा कृष्ण-दर्शन मात्र से दूर हो गई और कृष्ण की विशुद्ध धारणा से उनका शेष अशुभ नष्ट हो गया। शरीर छोड़ने के समय उन्होंने इंद्रियों की वृत्तियाँ रोककर प्रेमपूर्वक कृष्ण की स्तुति की। अंत में मन, वाणी और दृष्टि की वृत्तियों से अपने आत्मभाव को कृष्ण में लीन कर दिया।
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