विस्तृत उत्तर
युद्ध के बाद कृष्ण ने केवल सांत्वना ही नहीं दी, बल्कि पांडवों की स्थिति को संभालने में निर्णायक भूमिका निभाई। गंगा तट पर धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, द्रौपदी और युधिष्ठिर मृत स्वजनों के लिए शोक कर रहे थे। कृष्ण ने धौम्य आदि मुनियों के साथ उन्हें समझाया कि संसार के सभी प्राणी काल के अधीन हैं और मृत्यु से कोई बच नहीं सकता। इसके बाद कृष्ण ने अजातशत्रु युधिष्ठिर को वह राज्य वापस दिलाया जिसे धूर्तों ने छल से छीन लिया था। जिन राजाओं की आयु द्रौपदी के केशों को छूने से ही क्षीण हो चुकी थी, उनका वध कराया। फिर उन्होंने युधिष्ठिर से तीन अश्वमेध यज्ञ कराए और उनका पवित्र यश फैलाया।
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