विस्तृत उत्तर
कुंती की स्तुति सुनकर कृष्ण ने मुसकराकर उसे आश्वस्त किया और हस्तिनापुर लौट आए। वहाँ कुंती, सुभद्रा आदि देवियों से विदा लेकर जब वे जाने लगे, तब युधिष्ठिर ने बड़े प्रेम से उन्हें रोक लिया। उसके बाद पाठ युधिष्ठिर की भीतरी दशा बताता है: उन्हें अपने भाई-बंधुओं के मारे जाने का गहरा शोक था। व्यास आदि महर्षियों और स्वयं कृष्ण ने अनेक इतिहास सुनाकर उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन उनका शोक नहीं मिटा। युधिष्ठिर अपने स्वजनों के वध से दुखी थे और स्वयं को मोह से घिरा मान रहे थे। इसलिए कृष्ण को रोकना केवल स्नेह नहीं, बल्कि युद्ध के बाद टूटे हुए मन की स्थिति से भी जुड़ा था।
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