विस्तृत उत्तर
युधिष्ठिर को युद्ध का पाप इसलिए महसूस हुआ क्योंकि वे युद्ध को केवल विजय के रूप में नहीं देख पा रहे थे। वे मोह और स्नेह से व्याकुल होकर कहने लगे कि उनके भीतर अज्ञान गहराई तक बैठ गया है। उन्हें लगा कि उन्होंने इस नश्वर शरीर के लिए अनेक अक्षौहिणी सेनाओं का नाश कर डाला। वे बालकों, ब्राह्मणों, संबंधियों, मित्रों, चाचा-ताऊ, भाइयों और गुरुओं के प्रति किए गए द्रोह को याद कर रहे थे। शास्त्र-वचन यह है कि राजा प्रजा की रक्षा के लिए धर्मयुद्ध में शत्रु को मारे तो उसे पाप नहीं लगता। फिर भी युधिष्ठिर को इस कथन से संतोष नहीं मिला, क्योंकि उनका मन स्वजन-वध के शोक से भरा था।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





