विस्तृत उत्तर
कृष्ण भक्तों, बंधु-बांधवों, नागरिकों और सेवकों से उनकी योग्यता और संबंध के अनुसार मिलते हैं। द्वारका में प्रवेश करते समय उन्होंने सबका अलग-अलग सम्मान किया। किसी को सिर झुकाकर प्रणाम किया, किसी से वाणी से अभिवादन किया, किसी को हृदय से लगाया, किसी से हाथ मिलाया, किसी की ओर देखकर मुस्कराए और किसी को केवल प्रेमभरी दृष्टि से देखा। जिसकी जो इच्छा थी, उसे वही वरदान देकर संतुष्ट किया। वे चांडाल तक सबको प्रसन्न करके गुरुजनों, सपत्नीक ब्राह्मणों, वृद्धों और अन्य लोगों का आशीर्वाद लेते हुए नगर में प्रवेश करते हैं। यह व्यवहार दिखाता है कि कृष्ण का प्रेम केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं था; वे संबंध, पात्रता और भाव के अनुसार सबको मान देते थे।
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