विस्तृत उत्तर
कुंती स्तुति वह प्रार्थना है जो कुंती ने कृष्ण के जाने के समय की। अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से अपने पुत्रों और द्रौपदी के साथ मुक्त होने के बाद कुंती ने कृष्ण की स्तुति की। उसने कृष्ण को समस्त जीवों के भीतर और बाहर स्थित, इंद्रियों से न दिखने वाले, प्रकृति से परे आदिपुरुष परमेश्वर कहा। उसने कृष्ण को वासुदेव, देवकीनंदन, नंदगोपकुमार और गोविंद कहकर प्रणाम किया। कुंती ने याद किया कि कृष्ण ने देवकी को कंस से और पांडवों को विष, लाक्षागृह, राक्षसों, द्यूतसभा, वनवास, युद्धों और अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से बचाया। स्तुति में वह विपत्तियों, कृष्ण-दर्शन, भक्ति, मोह-त्याग और केवल कृष्ण में मन लगने की प्रार्थना करती है।
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