विस्तृत उत्तर
कृष्ण को पूर्णकाम इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे अपने आप में सदा पूर्ण हैं। द्वारका के लोग उन्हें भेंटें अर्पित करते हैं, पर कृष्ण को उन भेंटों से कोई कमी पूरी करनी नहीं होती। वे अपने आत्मलाभ से ही पूर्णकाम हैं। पूर्णकाम का भाव यह है कि जिनमें चाह की कमी न हो, जो स्वयं पूर्ण हों और जिन्हें कुछ प्राप्त करके पूर्ण होना न पड़े। फिर भी वे भक्तों की भेंट स्वीकार करते हैं, क्योंकि भक्त का प्रेम उनके लिए महत्वपूर्ण है। जैसे सूर्य को दीप चढ़ाने से सूर्य प्रकाशित नहीं होता, बल्कि अर्पण करने वाले की श्रद्धा प्रकट होती है, वैसे ही कृष्ण के सामने भेंट चढ़ाना भक्तों के प्रेम और समर्पण का रूप है।
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