विस्तृत उत्तर
कृष्ण गृहस्थ होकर भी निर्लिप्त रहे क्योंकि वे साधारण मनुष्य नहीं, परमेश्वर हैं। वे अपनी माया से मनुष्यलोक में अवतीर्ण हुए और रमणी-रत्नों के बीच साधारण मनुष्य की तरह लीला करते दिखे। उनकी रानियों का प्रेम बहुत गहरा था, फिर भी कामदेव तक जिनकी लजीली दृष्टि से विचलित हो जाए, वे भी कृष्ण के मन में तनिक विकार उत्पन्न नहीं कर सकीं। लोक के मूढ़ लोग उन्हें अपने समान आसक्त मनुष्य समझते हैं, क्योंकि वे कृष्ण के ईश्वरत्व को नहीं जानते। कृष्ण की भगवत्ता यही बताई गई है कि वे प्रकृति में स्थित होकर भी उसके गुणों से लिप्त नहीं होते। जैसे भगवान की शरणागत बुद्धि अपने भीतर रहने वाले प्राकृतिक गुणों से लिप्त नहीं होती, वैसे ही कृष्ण लीला करते हुए भी स्वतंत्र और असंग रहते हैं।
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