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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवत 1.11, श्लोक 33-39⏱ 1 मिनट पठन

कृष्ण गृहस्थ होकर भी निर्लिप्त कैसे रहे?

अंतिम अपडेट: 31 मई 2026

कृष्ण गृहस्थ होकर भी निर्लिप्त रहे क्योंकि वे साधारण मनुष्य नहीं, परमेश्वर हैं।

संक्षिप्त उत्तर

कृष्ण गृहस्थ होकर भी निर्लिप्त रहे क्योंकि वे परमेश्वर हैं; वे अपनी माया से मनुष्यलोक में लीला करते हैं, पर प्रकृति के गुण उन्हें बांध नहीं पाते।

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विस्तृत उत्तर

कृष्ण गृहस्थ होकर भी निर्लिप्त रहे क्योंकि वे साधारण मनुष्य नहीं, परमेश्वर हैं। वे अपनी माया से मनुष्यलोक में अवतीर्ण हुए और रमणी-रत्नों के बीच साधारण मनुष्य की तरह लीला करते दिखे। उनकी रानियों का प्रेम बहुत गहरा था, फिर भी कामदेव तक जिनकी लजीली दृष्टि से विचलित हो जाए, वे भी कृष्ण के मन में तनिक विकार उत्पन्न नहीं कर सकीं। लोक के मूढ़ लोग उन्हें अपने समान आसक्त मनुष्य समझते हैं, क्योंकि वे कृष्ण के ईश्वरत्व को नहीं जानते। कृष्ण की भगवत्ता यही बताई गई है कि वे प्रकृति में स्थित होकर भी उसके गुणों से लिप्त नहीं होते। जैसे भगवान की शरणागत बुद्धि अपने भीतर रहने वाले प्राकृतिक गुणों से लिप्त नहीं होती, वैसे ही कृष्ण लीला करते हुए भी स्वतंत्र और असंग रहते हैं।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवत 1.11, श्लोक 33-39
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

कृष्ण गृहस्थ होकर भी निर्लिप्त कैसे रहे को संदर्भ सहित समझें

कृष्ण गृहस्थ होकर भी निर्लिप्त कैसे रहे का सबसे सीधा सार यह है: कृष्ण गृहस्थ होकर भी निर्लिप्त रहे क्योंकि वे परमेश्वर हैं; वे अपनी माया से मनुष्यलोक में लीला करते हैं, पर प्रकृति के गुण उन्हें बांध नहीं पाते।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवत 1.11, श्लोक 33-39 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवत 1.11, श्लोक 33-39 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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