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पढ़िए अरण्यकांड भाग 9 – मारीच की माया, स्वर्ण मृग की अद्भुत लीला और रावण का कपटपूर्ण षड्यंत्र !
अरण्यकांड

अरण्यकांड भाग 9 – मारीच की माया

📿 पौराणिक•8 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 20 अप्रैल 2025
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कैसे मारीच ने रचा स्वर्ण मृग का मायाजाल और रावण ने सीता हरण की साजिश रची – अरण्यकांड की गहन कथा

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मारीच और स्वर्ण मृग की योजना

मारीच और स्वर्ण मृग की योजना

रावण को अचानक अपने आश्रम पर आया देख मारीच चकित हुआ। उसने आवश्यक्तानुसार रावण की अगवानी की और आदरपूर्वक पूछा – “हे तात! किस कारण आपका मन इतना व्यग्र है और आप अकेले यहाँ पधारे हैं?”

रावण ने तब शूर्पणखा के साथ हुआ सारा घटनाक्रम मरिच को सुनाया। अपनी बहन के अपमान और भाइयों के वध का बदला लेने के लिए उसने मरिच को आज्ञा दी – तुम छल करने वाले मायावी हिरण बनो, जिस उपाय से मैं उस राजकुमारी (सीता) का हरण कर सकूँ।

दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें॥
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी॥
व्याख्या: दुर्भाग्य से अभिमानी रावण ने सारी कथा मरिच को सुनाकर कहा – “तुम छल-कपट करने वाले मृग बन जाओ, ताकि मैं उस राजा की स्त्री (सीताजी) को छलपूर्वक हर लाऊँ।” रावण की मंशा थी कि मारीच स्वर्ण मृग बनकर राम और लक्ष्मण को कुटिया से दूर ले जाए ताकि वह अकेली सीता का अपहरण कर सके।

रावण की आज्ञा सुनते ही मरिच सन्न रह गया। उसने विनम्र किंतु स्पष्ट शब्दों में रावण को समझाने का प्रयास किया। मरिच ने कहा – “हे दशशीश (रावण)! सुनिए, वे कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि चराचर के स्वामी भगवान हैं जो मानव रूप में अवतीर्ण हुए हैं। हे तात! उनसे बैर मत कीजिए। जीवन और मृत्यु तो उन्हीं के अधीन हैं।” मरिच ने राम की शक्ति और ईश्वरत्व को पहचान लिया था:

तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा॥
तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥
व्याख्या: मारीच ने समझाया – “हे दशग्रीव! सुनो, वे मानव रूप में सम्पूर्ण जगत के ईश्वर हैं। हे तात! तुम उनसे वैर मत करो। उनके मारने से ही मरना और जिलाने से ही जीवित रहना संभव है।” अर्थात् जीवन-मरण सब उन्हीं की इच्छा से होता है, उनसे शत्रुता मोल लेना विनाश को आमंत्रण देना है।

मारीच का निर्णय

मारीच ने रावण को याद दिलाया कि वही राम विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा के लिए आए थे और उन्होंने ताड़का-सुबाहु जैसे राक्षसों का वध किया था। “बालक राम ने एक बिना फल का बाण चलाकर मुझे भी सौ योजन दूर सागर तट पर फेंक दिया था। ऐसे राम से शत्रुता करना उचित नहीं।”

मारीच बोला – “मेरी दशा तो उस कीट (सूंडी) जैसी हो गई है जिसे भृंग (भंवरा) पकड़कर मदान्ध कर देता है – अब मुझे जंगल में, पर्वत पर, हर ओर केवल राम-लक्ष्मण ही दिखते हैं। और यदि वे मनुष्य ही हैं, तो भी इतने बड़े शूरवीर हैं कि उनसे विरोध में सफलता मिलना असंभव है।” मरिच स्पष्ट जान चुका था कि राम से बैर लेना आत्मघात है।

लेकिन रावण अपनी शक्ति पर बहुत घमंड में था। मरिच के समझाने पर वह क्रुद्ध होकर उसे भला-बुरा कहने लगा। रावण ने धमकी दी कि “अगर तूने मेरी बात नहीं मानी तो मैं स्वयं तुझे प्राण से मार दूँगा। संसार में मेरे समान योद्धा कौन है, जो तू मुझे ज्ञान सिखा रहा है!” रावण की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। यह देख मरिच मन ही मन समझ गया कि दोनों ओर से उसका मरना तय है – या तो अभी रावण के हाथों या फिर राम के बाणों से।

उसने सोचा कि रावण जैसे मूढ़, शस्त्रधारी स्वामी का विरोध करने में कल्याण नहीं है। अतः उसने एक निर्णय लिया। मरिच ने हृदय में विचार किया:

“यदि मैं रावण की आज्ञा नहीं मानूँगा तो वह अभी मुझे मार डालेगा। और अगर मैं राम के हाथों मारा जाऊँ, तो भी मृत्यु निश्चित है परंतु वह मृत्यु धन्य होगी। राम के बाण से मारा जाना मेरे लिए परम कल्याणकारी मार्ग होगा।”

मरिच ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह रावण की बात मानकर राम के हाथों मारा जाना ही श्रेष्ठ समझेगा। उसने रावण से कहा – “ठीक है, मैं आपका आदेश पालन करूँगा।” भीतर ही भीतर उसने श्रीराम के चरणों में मन लगा लिया। तुलसीदासजी लिखते हैं:

उभय भाँति देखा निज मरना। तब तजि रघुनायक सरना॥
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा॥
व्याख्या: मरिच ने दोनों ओर से अपना मरना सुनिश्चित देखा, तब उसने (राम की शरण जाना उचित समझकर) रावण के साथ जाने का निश्चय किया। हृदय में ऐसा विचार कर वह दशानन (रावण) के साथ चल पड़ा, परंतु रामजी के चरणों में उसका प्रेम अटूट और अचल था। मरिच को प्रसन्नता थी कि राम-दर्शन कर जीवन सफल होगा और प्रभु के हाथों मोक्ष रूपी मृत्यु मिलेगी। इस प्रकार मरिच जैसे पूर्व शत्रु ने भी अंततः प्रभु राम को परम प्रिय मानकर अपने प्राण अर्पित करने का निश्चय किया।

स्वर्ण मृग की लीला और मरिच की मुक्ति

अब रावण और मरिच एक साथ पंचवटी की ओर चल पड़े। मार्ग भर मरिच अपने परम आराध्य राम के दर्शन की आशा से आनंदित था और रावण के सामने इस हर्ष को छिपाए रहा। जब लंका का राजा रावण दंडक वन के निकट पहुँचा, तब मायावी मरिच ने स्वर्णमृग का रूप धारण कर लिया। वह हिरण अत्यंत अद्भुत और अनुपम सौंदर्य वाला था:

तेहि बननिकट दसानन गयउ। तब मारीच कपटमृग भयउ॥
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई॥
व्याख्या: जंगल के समीप पहुँचते ही रावण ने मरिच को आगे भेज दिया और मरिच ने एक मनमोहन स्वर्ण मृग का रूप धारण कर लिया। वह मृग ऐसा अत्यंत विचित्र, अनुपम सुन्दर था कि जिसका वर्णन करना कठिन है। उसका सुनहरा शरीर बहुमूल्य रत्नों से जड़ित प्रतीत होता था।

पंचवटी आश्रम के निकट उस सुनहरे हिरण को छल-क्रीड़ा करते देखा तो माता सीता मोहित हो गईं। मृग की चमक-दमक मन को लुभाने वाली थी। सीताजी ने उत्सुक होकर राम से कहा – “हे स्वामी! इस हिरण की छाल बहुत सुंदर है। यदि आप इसे मारकर इसका स्वर्ण-मृगचर्म ला सकें तो हमारी कुटिया की शोभा बढ़ेगी।” जनकनंदिनी ने इस अनुरोध में पति की मर्यादा का भी स्मरण दिलाया:

सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही॥
व्याख्या: वैदेही सीताजी कहती हैं – “हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो! कृपा करके इस मृग का शिकार कीजिए और इसका चर्म (चमड़ा) मेरे लिए ले आइए।” सीताजी तपस्विनी होते हुए भी स्वाभाविक रूप से एक राजकुमारी थीं, इसलिए स्वर्ण मृग को देखकर उनका मन मोहित हुआ और उन्होंने पहली बार वनवास में श्रीराम से कोई इच्छा व्यक्त की।

रामजी मन ही मन जानते थे कि यह मृग कपट है, पर उन्होंने देवताओं के कार्य सिद्ध करने हेतु सीताजी की यह इच्छा स्वीकार करने का निश्चय किया। श्रीराम ने लक्ष्मण को सावधान करते हुए कुटिया में रहकर सीता की रक्षा करने की आज्ञा दी, क्योंकि यह मृग उन्हें संदेहास्पद लग रहा था। रामजी ने समझाया कि “वन में अनेक राक्षस घूमते रहते हैं। मैं इस मृग का पीछा करता हूँ, तुम सीता माताजी की रक्षा हेतु यहीं रहना।”

आज्ञा देकर रामजी धनुष-बाण सँभालकर उस हिरण के पीछे चल पड़े। हिरण राम को अपने पीछे दूर-दूर तक वन में दौड़ाने लगा – कभी पास आता, हाथ न आने पर फिर दूर छलाँग लगाकर भाग जाता था। स्वयं भगवन श्रीराम, जिनके बारे में वेद “नेति-नेति” कहकर थक जाते हैं और शिव ध्यान में जिन्हें नहीं पा सकते, वे ही प्रभु मायामृग के पीछे दौड़ते चले गए। यह दृश्य दिखाकर तुलसीदासजी यह बतलाते हैं कि ईश्वर भी अपनी लीला में मनुष्यवत व्यवहार करते हैं।

आखिरकार मरिच काफी दूर जंगल में राम को व्यर्थ घुमाकर थकाने के बाद एक स्थान पर रुक गया। रामजी को अवसर मिला और उन्होंने तुरंत अपना अमोघ बाण छोड़ दिया। तीर लगते ही स्वर्ण मृग ने एक ह्रदय-विदारक चीख निकाली और धराशायी हो गया:

तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥
व्याख्या: लक्ष्य साधकर रामजी ने एक कठोर तीर मारीच को मारा। घोर चीत्कार करता हुआ वह मायावी हिरण पृथ्वी पर गिर पड़ा। मरते समय मारीच ने अपने असली रूप में आते-आते ज़ोर से आवाज़ निकाली – “हा लक्ष्मण! हा सीते!” यह मरिच की आखिरी चाल थी। उसने श्रीराम की आवाज़ की नक़ल करते हुए ऐसे चिल्लाया मानो राम स्वयं संकट में पड़ गए हों और लक्ष्मण को पुकार रहे हों।

श्रीराम को तुरंत समझ आ गया कि मरिच आखिरी भ्रमजाल रच गया है। उन्होंने एक क्षण को चिंता की कि यह पुकार सुनकर कहीं भाई लक्ष्मण चिंतित होकर कुटिया न छोड़ दें।

उधर राम मरिच के शरीर के पास गए और उसके अंतिम क्षणों में उसे मुक्ति का आश्वासन दिया। मरिच ने “राम-राम” कहते हुए प्राण त्याग दिए। प्रभु ने करुणा करके उसे अपने परमधाम का अधिकारी बना दिया। देवताओं ने फिर स्तुति की कि “दीनबंधु राम ने तो इस असुर को भी अपना निज पद प्रदान कर दिया।” श्रीराम ने अब शीघ्र-से-शीघ्र लौटने का विचार किया और तत्काल पंचवटी की ओर वापस चल पड़े।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस के सात काण्डों के नाम क्या हैं?

(1) बालकाण्ड, (2) अयोध्याकाण्ड, (3) अरण्यकाण्ड, (4) किष्किन्धाकाण्ड, (5) सुन्दरकाण्ड, (6) लंकाकाण्ड, (7) उत्तरकाण्ड। 'सप्त प्रबंध सुभग सोपाना' — मानस सरोवर की सात सुन्दर सीढ़ियाँ।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में कुल कितने काण्ड हैं?

सात काण्ड — बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड, उत्तरकाण्ड। 'सप्त प्रबंध सुभग सोपाना' — सात सोपान (सीढ़ियाँ) मानस सरोवर की।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का सबसे छोटा काण्ड कौन सा है?

किष्किन्धाकाण्ड (~30 दोहे) — सबसे छोटा। बालकाण्ड (~361 दोहे) सबसे बड़ा। अरण्यकाण्ड (~46) भी छोटे काण्डों में।

धर्मग्रंथ परिचय

रामायण में कितने काण्ड हैं?

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों में सात काण्ड हैं — बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड (लंकाकाण्ड) और उत्तरकाण्ड। वाल्मीकि रामायण में लगभग 24,000 श्लोक हैं।

हिंदू दर्शन

रामायण में कितने कांड हैं प्रत्येक का विषय

वाल्मीकि रामायण — 7 कांड, ~24,000 श्लोक: बालकांड (जन्म-स्वयंवर), अयोध्याकांड (वनवास-दशरथ मृत्यु), अरण्यकांड (वन-सीता हरण), किष्किंधाकांड (सुग्रीव-बालि), सुंदरकांड (हनुमान-लंका), युद्धकांड (लंका युद्ध-रावण वध), उत्तरकांड (राम राज्य)। सुंदरकांड सबसे शुभ।

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