मारीच और स्वर्ण मृग की योजना
रावण को अचानक अपने आश्रम पर आया देख मारीच चकित हुआ। उसने आवश्यक्तानुसार रावण की अगवानी की और आदरपूर्वक पूछा – “हे तात! किस कारण आपका मन इतना व्यग्र है और आप अकेले यहाँ पधारे हैं?”
रावण ने तब शूर्पणखा के साथ हुआ सारा घटनाक्रम मरिच को सुनाया। अपनी बहन के अपमान और भाइयों के वध का बदला लेने के लिए उसने मरिच को आज्ञा दी – तुम छल करने वाले मायावी हिरण बनो, जिस उपाय से मैं उस राजकुमारी (सीता) का हरण कर सकूँ।
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी॥
रावण की आज्ञा सुनते ही मरिच सन्न रह गया। उसने विनम्र किंतु स्पष्ट शब्दों में रावण को समझाने का प्रयास किया। मरिच ने कहा – “हे दशशीश (रावण)! सुनिए, वे कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि चराचर के स्वामी भगवान हैं जो मानव रूप में अवतीर्ण हुए हैं। हे तात! उनसे बैर मत कीजिए। जीवन और मृत्यु तो उन्हीं के अधीन हैं।” मरिच ने राम की शक्ति और ईश्वरत्व को पहचान लिया था:
तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥
मारीच का निर्णय
मारीच ने रावण को याद दिलाया कि वही राम विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा के लिए आए थे और उन्होंने ताड़का-सुबाहु जैसे राक्षसों का वध किया था। “बालक राम ने एक बिना फल का बाण चलाकर मुझे भी सौ योजन दूर सागर तट पर फेंक दिया था। ऐसे राम से शत्रुता करना उचित नहीं।”
मारीच बोला – “मेरी दशा तो उस कीट (सूंडी) जैसी हो गई है जिसे भृंग (भंवरा) पकड़कर मदान्ध कर देता है – अब मुझे जंगल में, पर्वत पर, हर ओर केवल राम-लक्ष्मण ही दिखते हैं। और यदि वे मनुष्य ही हैं, तो भी इतने बड़े शूरवीर हैं कि उनसे विरोध में सफलता मिलना असंभव है।” मरिच स्पष्ट जान चुका था कि राम से बैर लेना आत्मघात है।
लेकिन रावण अपनी शक्ति पर बहुत घमंड में था। मरिच के समझाने पर वह क्रुद्ध होकर उसे भला-बुरा कहने लगा। रावण ने धमकी दी कि “अगर तूने मेरी बात नहीं मानी तो मैं स्वयं तुझे प्राण से मार दूँगा। संसार में मेरे समान योद्धा कौन है, जो तू मुझे ज्ञान सिखा रहा है!” रावण की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। यह देख मरिच मन ही मन समझ गया कि दोनों ओर से उसका मरना तय है – या तो अभी रावण के हाथों या फिर राम के बाणों से।
उसने सोचा कि रावण जैसे मूढ़, शस्त्रधारी स्वामी का विरोध करने में कल्याण नहीं है। अतः उसने एक निर्णय लिया। मरिच ने हृदय में विचार किया:
“यदि मैं रावण की आज्ञा नहीं मानूँगा तो वह अभी मुझे मार डालेगा। और अगर मैं राम के हाथों मारा जाऊँ, तो भी मृत्यु निश्चित है परंतु वह मृत्यु धन्य होगी। राम के बाण से मारा जाना मेरे लिए परम कल्याणकारी मार्ग होगा।”
मरिच ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह रावण की बात मानकर राम के हाथों मारा जाना ही श्रेष्ठ समझेगा। उसने रावण से कहा – “ठीक है, मैं आपका आदेश पालन करूँगा।” भीतर ही भीतर उसने श्रीराम के चरणों में मन लगा लिया। तुलसीदासजी लिखते हैं:
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा॥
स्वर्ण मृग की लीला और मरिच की मुक्ति
अब रावण और मरिच एक साथ पंचवटी की ओर चल पड़े। मार्ग भर मरिच अपने परम आराध्य राम के दर्शन की आशा से आनंदित था और रावण के सामने इस हर्ष को छिपाए रहा। जब लंका का राजा रावण दंडक वन के निकट पहुँचा, तब मायावी मरिच ने स्वर्णमृग का रूप धारण कर लिया। वह हिरण अत्यंत अद्भुत और अनुपम सौंदर्य वाला था:
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई॥
पंचवटी आश्रम के निकट उस सुनहरे हिरण को छल-क्रीड़ा करते देखा तो माता सीता मोहित हो गईं। मृग की चमक-दमक मन को लुभाने वाली थी। सीताजी ने उत्सुक होकर राम से कहा – “हे स्वामी! इस हिरण की छाल बहुत सुंदर है। यदि आप इसे मारकर इसका स्वर्ण-मृगचर्म ला सकें तो हमारी कुटिया की शोभा बढ़ेगी।” जनकनंदिनी ने इस अनुरोध में पति की मर्यादा का भी स्मरण दिलाया:
रामजी मन ही मन जानते थे कि यह मृग कपट है, पर उन्होंने देवताओं के कार्य सिद्ध करने हेतु सीताजी की यह इच्छा स्वीकार करने का निश्चय किया। श्रीराम ने लक्ष्मण को सावधान करते हुए कुटिया में रहकर सीता की रक्षा करने की आज्ञा दी, क्योंकि यह मृग उन्हें संदेहास्पद लग रहा था। रामजी ने समझाया कि “वन में अनेक राक्षस घूमते रहते हैं। मैं इस मृग का पीछा करता हूँ, तुम सीता माताजी की रक्षा हेतु यहीं रहना।”
आज्ञा देकर रामजी धनुष-बाण सँभालकर उस हिरण के पीछे चल पड़े। हिरण राम को अपने पीछे दूर-दूर तक वन में दौड़ाने लगा – कभी पास आता, हाथ न आने पर फिर दूर छलाँग लगाकर भाग जाता था। स्वयं भगवन श्रीराम, जिनके बारे में वेद “नेति-नेति” कहकर थक जाते हैं और शिव ध्यान में जिन्हें नहीं पा सकते, वे ही प्रभु मायामृग के पीछे दौड़ते चले गए। यह दृश्य दिखाकर तुलसीदासजी यह बतलाते हैं कि ईश्वर भी अपनी लीला में मनुष्यवत व्यवहार करते हैं।
आखिरकार मरिच काफी दूर जंगल में राम को व्यर्थ घुमाकर थकाने के बाद एक स्थान पर रुक गया। रामजी को अवसर मिला और उन्होंने तुरंत अपना अमोघ बाण छोड़ दिया। तीर लगते ही स्वर्ण मृग ने एक ह्रदय-विदारक चीख निकाली और धराशायी हो गया:
श्रीराम को तुरंत समझ आ गया कि मरिच आखिरी भ्रमजाल रच गया है। उन्होंने एक क्षण को चिंता की कि यह पुकार सुनकर कहीं भाई लक्ष्मण चिंतित होकर कुटिया न छोड़ दें।
उधर राम मरिच के शरीर के पास गए और उसके अंतिम क्षणों में उसे मुक्ति का आश्वासन दिया। मरिच ने “राम-राम” कहते हुए प्राण त्याग दिए। प्रभु ने करुणा करके उसे अपने परमधाम का अधिकारी बना दिया। देवताओं ने फिर स्तुति की कि “दीनबंधु राम ने तो इस असुर को भी अपना निज पद प्रदान कर दिया।” श्रीराम ने अब शीघ्र-से-शीघ्र लौटने का विचार किया और तत्काल पंचवटी की ओर वापस चल पड़े।






