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पढ़िए अरण्यकांड भाग 9: पंचवटी में श्रीराम-लक्ष्मण की लीलाएं, खर-दूषण वध और शूर्पणखा का विलाप !
अरण्यकांड

पढ़िए अरण्यकांड भाग 9: पंचवटी में श्रीराम-लक्ष्मण की लीलाएं, खर-दूषण वध और शूर्पणखा का विलाप !

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अरण्य कांड – भाग 9: पंचवटी में शूर्पणखा

अरण्य कांड – भाग 9: पंचवटी में शूर्पणखा

प्रभु श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण पंचवटी में तपस्वी जीवन बिता रहे थे। तभी लंका के राजा रावण की बहन शूर्पणखा वहाँ आ पहुँची। तुलसीदासजी लिखते हैं:

सूपनहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥
व्याख्या: शूर्पणखा रावण की बहन थी, जिसके हृदय में दुष्टता भरी थी और जो एक ज़हरीले सर्पिणी के समान भयानक थी। एक दिन वह पंचवटी पहुँची और वहाँ वन में विराजमान दोनों राजकुमारों (राम-लक्ष्मण) को देखकर कामावेश में व्याकुल हो गई।

शूर्पणखा ने मानव-रूप धारण कर लिया और प्रभु राम के पास मनमोहक मुस्कान के साथ पहुंचकर उनसे कहा:

परुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥
व्याख्या: शूर्पणखा ने सुंदर स्त्री का रूप धरकर प्रभु श्रीराम के पास जाकर मुस्कुराते हुए कहा – “आप जैसा पुरुष और मेरे जैसी स्त्री कोई नहीं है। यह जोड़ा विधाता ने बड़ी सोच-विचारकर बनाया है।” वह आगे कहती है कि तीनों लोकों में वर खोजा, किंतु नहीं मिला, इसलिए अब तक अविवाहित रही है। अब श्रीराम को देखकर उसका मन उन पर आसक्त हो गया है।

श्रीराम ने सीताजी की ओर देखकर विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि “मेरे छोटे भाई लक्ष्मण अविवाहित हैं।” इसी संकेत को पाकर शूर्पणखा लक्ष्मणजी के पास चली गई। लक्ष्मण जी तुरंत समझ गए कि यह रावण की बहन है, फिर भी कोमल वाणी में बोले:

सुंदरि सुनु मैं उन्हाधीन नहिं तोर सुपासा॥
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥
व्याख्या: लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा – “हे सुंदरि, सुनो! मैं तो श्रीरामजी का सेवक हूँ, इसलिए तुम्हारी इच्छा पूरी करना मेरे वश में नहीं है। मेरे प्रभु अयोध्या के राजा हैं, वे जो कुछ करेंगे वही सबके लिए शुभ होगा।”

लक्ष्मणजी विनम्रतापूर्वक टाल रहे थे, लेकिन कामांध शूर्पणखा इस अस्वीकार से क्रोधित हो उठी। उसने देखा कि रामजी उसे स्वीकार नहीं कर रहे, क्योंकि सीताजी उनके साथ हैं।

ईर्ष्या में भरकर वह सीताजी को मारने दौड़ी ताकि रास्ता साफ हो जाए। यह देखते ही श्रीराम ने लक्ष्मण को संकेत किया कि शूर्पणखा पर अंकुश लगाया जाए। लक्ष्मणजी ने तत्काल नाक और कान काटकर उसे विकलांग कर दिया।

शूर्पणखा विकृति और खर-दूषण युद्ध

लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥
व्याख्या: लक्ष्मणजी ने बड़ी फुर्ती से उस राक्षसी को बिना नाक-कान की कर दिया (उसकी नाक-कान काट डाले)। ऐसा प्रतीत हुआ मानो इस कर्म द्वारा रावण को चुनौती दे दी हो कि हम तुम्हारे अत्याचारों से नहीं डरते।

नाक-कान कटते ही शूर्पणखा का स्वरूप अत्यंत भयंकर हो गया – रक्त की धारायें बह चलीं। तुलसीदास कहते हैं:

नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥
व्याख्या: नाक-कान कट जाने से शूर्पणखा बड़ी विकराल हो गई। उसके शरीर से रक्त ऐसे बह रहा था मानो किसी काले पर्वत से गेरू (लाल रंग) की धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई खर-दूषण के पास पहुँची और उन्हें धिक्कारते हुए बोली – “भइया! धिक्कार है तुम्हारे पुरुषार्थ और बल पर (कि मेरी ऐसी दशा हो गई)।”

खर-दूषण का क्रोध और युद्ध

अपनी बहन की यह दशा देखकर खर और दूषण क्रोध से आग-बबूला हो उठे। वे तुरंत श्रीराम पर आक्रमण करने दौड़े। राक्षसों ने भयानक अस्त्र-शस्त्रों से रामजी को घेर लिया।

उधर रघुनाथजी ने सीताजी को सुरक्षा के लिए गुफा में छिप जाने को कहा और लक्ष्मण से उनकी रक्षा करने को बोलकर स्वयं धनुष-संधान करके युद्धभूमि में उतर आए।

रामजी के धनुष की टंकार सुनते ही राक्षस स्तब्ध हो गए – कई तो बधिर होकर डगमगा गए। प्रभु श्रीराम अकेले ही अद्भुत पराक्रम दिखाने लगे, बाण छोड़कर उन्होंने असंख्य राक्षसों का संहार कर डाला।

रामबाण के प्रचंड प्रहार से राक्षसों के अंग-भंग होकर भूमिसात् होने लगे। दृश्य अत्यंत भयानक था – चारों ओर राक्षसों के धड़ गिर रहे थे, भूत-प्रेत-पाली आदि अट्टहास कर रहे थे, शुष्क कंठों से ‘धर पकड़ो’ की भयावनी ध्वनि गूंज रही थी।

जो राक्षस बचते, वे प्राण लेकर भागने लगे। यह देख खर, दूषण और उनके भाई त्रिशिरा क्रोध में चिल्लाए कि जो पीठ दिखाकर भागेगा उसे अपने ही हाथों से मार देंगे। डरकर शेष राक्षस फिर लड़ने मुड़े, पर श्रीराम के तीखे बाणों ने उनका संहार जारी रखा।

क्षण भर में ही भगवान कृपासिन्धु राम ने समूची राक्षस-सेना का नाश कर दिया। मरते समय वे राक्षस “राम-राम” कहते हुए प्राण त्यागने लगे और प्रभु की कृपा से उन्हें निर्वाण पद (मोक्ष) भी प्राप्त हुआ:

राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।
करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान॥
व्याख्या: शत्रु राक्षस “राम-राम” कहते हुए (अपने सारे पाप जलाकर) देह त्यागते गए और परमपद को प्राप्त होते गए। श्रीराम ने युक्तिपूर्वक क्षण भर में ही उन शत्रुओं को मार गिराया। यहाँ भगवान की करुणा दृष्टि देखिए कि जिन्हें वे अपने बाणों से मार रहे हैं, उन्हें ही मृत्यु के समय प्रभु नाम सुमिरन से मोक्ष का वरदान भी दे रहे हैं।

अंततः श्रीराम के बाणों से खुद खर, दूषण और त्रिशिरा भी मारे गए। युद्ध समाप्त हुआ। देवताओं ने प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा की और प्रभु की स्तुति की कि दीनबंधु राम ने असुरों को भी अपना परमधाम दे दिया।

श्रीराम ने अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए और कमर में तरकस सजाए हुए विजयी होकर लौटने का मन बनाया।

शूर्पणखा द्वारा रावण को भड़काना

उधर अपने भाइयों की मृत्यु और सेना के विनाश को देखकर शूर्पणखा का मन प्रतिशोध की आग में जलने लगा। वह सीधे लंका पहुँची और रावण के दरबार में जाकर बिलख-बिलखकर रावण को अपमानित करने लगी।

क्रोध में कांपती शूर्पणखा ने रावण को असफल शासक कहते हुए ताने दिए कि वह राज्य और ख़ज़ाने की सुध भुलाकर दिन-रात शराब पीकर सोया रहता है। उसे यह भी सुध नहीं कि उसके सिर पर शत्रु आ पहुँचा है। नीति की बातें कहते हुए वह बोली:

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।
अस कहि बिबिधगी रोदन करन॥
व्याख्या: शूर्पणखा रावण को फटकार लगाते हुए नीति-कथन कहती है – “शत्रु, रोग (बीमारी), आग, पाप, स्वामी और सर्प – इन्हें कभी तुच्छ समझकर नजरअंदाज़ नहीं करना चाहिए।” अर्थात् इन्हें बढ़ने का मौका दिया तो बड़ी हानि हो सकती है। ऐसा कहकर वह तरह-तरह से विलाप करती हुई रोने लगी।

रावण की सभा में सबको आश्चर्य हुआ और सभा-सदस्य तुरंत घबरा कर उठ खड़े हुए। उन्होंने शूर्पणखा को ढाढ़स बंधाया और उसकी बाँह पकड़कर उसे उठाया।

तब लंकापति रावण ने क्रुद्ध होकर पूछा – “हमें पूरी बात बताओ, तुम्हारे नाक-कान किसने काटे?”

शूर्पणखा ने अपने साथ हुए समस्त अपमान की कथा सुनानी शुरू की। उसने कहा कि अयोध्या के राजा दशरथ के दो राजकुमार, जो पुरुषों में सिंह के समान हैं, वन में आए हुए हैं। उसने समझ लिया है कि वे अवश्य पृथ्वी को राक्षस-रहित करने के लिए ही अवतरित हुए हैं।

अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥
सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥
व्याख्या: शूर्पणखा कहती है – “वे दोनों भाई अतुलनीय बल और प्रताप वाले हैं। वे दुष्टों के वध में रत हैं तथा देवताओं एवं मुनियों को सुख देने वाले हैं। शोभा के धाम उन वीर का नाम राम है और उनके संग एक स्यामा (सांवली) स्त्री है।” इस प्रकार उसने सीताजी की उपस्थिति का उल्लेख किया।

फिर वह सीताजी के अनुपम सौंदर्य का बखान करते हुए रावण को उकसाने लगी:

रूप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी॥
तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा॥
व्याख्या: वह कहती है – “वह स्त्री सौंदर्य की राशि है, विधाता ने उसे स्वयं गढ़ा है। उसकी सुंदरता पर कामदेव की करोड़ों शक्तियाँ भी बलिहारी हैं। उसी स्त्री के लिए तुम्हारे अनुज के हाथों मेरे नाक-कान काटे गए और अब सभी तुम्हारी बहन पर हँस रहे हैं।”

रावण का क्रोध, चिन्ता और सीता हरण की योजना

व्याख्या: शूर्पणखा कहती है – “ब्रह्मा ने उस स्त्री (सीता) को रूप की ऐसी खान बनाई है कि सौ करोड़ रति (कामदेव की पत्नी) भी जिसके रूप पर बलिहार जाएँ। उसी स्त्री के पति के छोटे भाई (लक्ष्मण) ने मेरे कान और नाक काट दिए। यह सुनकर (राम-लक्ष्मण ने) यह भी परिहास किया कि मैं तुम्हारी (रावण की) बहन हूँ।”

यहाँ वह रावण के अहंकार को चोट पहुंचा रही है कि “तेरे जीते जी शत्रुओं ने तेरी बहन को ऐसा दुर्दशा बना दिया और हँसी उड़ाई।”

इतना सुनना था कि रावण का क्रोध दसों दिशाओं में प्रज्वलित हो उठा। वह पूरे शरीर में अपमान और क्रोध से सुलगने लगा। शूर्पणखा ने आगे बताया कि उसकी चीख-पुकार सुन खर-दूषण सेना सहित आए अवश्य, पर राम ने पल भर में पूरी सेना का संहार कर डाला।

खर, दूषण और त्रिशिरा जैसे बलवान राक्षसों को राम ने मौत के घाट उतार दिया। यह सुनते ही रावण के रोम-रोम में आग सी लग गई – वह अपमान, शोक और क्रोध से पागल हो उठा।

रावण ने पहले तो सबके सामने शूर्पणखा को समझा-बुझाकर अपने बल-पराक्रम का आश्वासन दिया। परंतु मन ही मन वह अत्यंत चिंता में डूब गया।

वह सभा से उठकर अपने महल में चला गया, पर रात भर उसे नींद नहीं आई। बिस्तर पर करवटें बदलते हुए रावण सोचने लगा कि खर-दूषण मेरे ही समान बलवान थे, उन्हें मारना साधारण मानव के बस की बात नहीं।

अवश्य ही जो भी ये राजकुमार हैं, कोई दैवी शक्ति लेकर अवतरित हुए हैं। उसके मन में विचार आया कि यदि भगवान् विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मानव रूप में अवतार लिया है, तो उसे छल से ही हराया जा सकता है।

उसी रात रावण ने एक कपटयुक्त योजना बनाई। वह सीताजी को हरण करने का उपाय सोचने लगा, क्योंकि शूर्पणखा के वर्णन ने उसके मन में सीता को पाने की प्रबल कामना भी जगा दी थी।

उसने निश्चय किया कि सीता को पाने के लिए वह मरिच नाम के मायावी राक्षस की मदद लेगा। मरिच पहले भी रामजी के हाथों परास्त हो चुका था और तपस्या करता हुआ समुद्र तट पर रहता था।

रावण प्रातः होते ही अपने रथ पर सवार होकर मरिच के आश्रम की ओर चल पड़ा।

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