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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवत 1.8, श्लोक 25⏱ 1 मिनट पठन

विपदः सन्तु नः शश्वत् का अर्थ क्या है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026

विपदः सन्तु नः शश्वत् कुंती की प्रसिद्ध प्रार्थना का आरंभ है।

संक्षिप्त उत्तर

इस वाक्य का भाव है कि हमारे जीवन में विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि विपत्तियों में कृष्ण का दर्शन होता है और उनका दर्शन जन्म-मृत्यु से मुक्त करता है।

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विस्तृत उत्तर

विपदः सन्तु नः शश्वत् कुंती की प्रसिद्ध प्रार्थना का आरंभ है। दिए गए हिंदी अर्थ में कुंती भगवान से कहती है कि हमारे जीवन में सदा, पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहें। इसका कारण वह तुरंत बताती है: विपत्तियों में निश्चित रूप से कृष्ण का दर्शन होता है। फिर वह कृष्ण-दर्शन का फल बताती है कि दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता। इसलिए इस वाक्य का अर्थ केवल दुख या संकट मांगना नहीं है। कुंती के भाव में विपत्ति वह अवसर है जिसमें भक्त कृष्ण को याद करता है, उनका दर्शन पाता है और संसार के जन्म-मरण से छूटने की दिशा में जाता है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवत 1.8, श्लोक 25
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

विपदः सन्तु नः शश्वत् का अर्थ क्या है को संदर्भ सहित समझें

विपदः सन्तु नः शश्वत् का अर्थ क्या है का सबसे सीधा सार यह है: इस वाक्य का भाव है कि हमारे जीवन में विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि विपत्तियों में कृष्ण का दर्शन होता है और उनका दर्शन जन्म-मृत्यु से मुक्त करता है।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवत 1.8, श्लोक 25 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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