शोध प्रतिवेदन: 'ओम जय अम्बे गौरी' आरती — पाठ, ऐतिहासिक उद्गम, धर्मशास्त्रीय मीमांसा एवं अनुष्ठानिक विश्लेषण
2. मूल पाठ: श्री अम्बे गौरी आरती
3. ऐतिहासिक उद्गम और रचयिता का परिचय
किसी भी साहित्यिक कृति का सही मूल्यांकन उसके रचयिता और कालखंड को समझे बिना अधूरा है। "ओम जय अम्बे गौरी" आरती के संदर्भ में जनमानस में अनेक भ्रांतियां प्रचलित हैं। शोध के दौरान प्राप्त ऐतिहासिक दस्तावेजों और वंशावली अभिलेखों के आधार पर, हम इस आरती के वास्तविक उद्गम तक पहुँचने का प्रयास करेंगे।
3.1 रचयिता की पहचान: भ्रम और निवारण
आम धारणा के विपरीत, इस आरती के रचयिता ऋषिकेश स्थित 'दिव्य जीवन संघ' के संस्थापक स्वामी शिवानन्द सरस्वती नहीं हैं। आरती की अंतिम पंक्ति "कहत शिवानन्द स्वामी" ने इस नाम साम्य के कारण भ्रम उत्पन्न किया है। भाषाई विश्लेषण और ऐतिहासिक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि यह आरती आधुनिक काल की नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत की रचना है। इसकी भाषा (ब्रज और गुजराती मिश्रित हिंदी) और शब्दावली 16वीं-17वीं शताब्दी की ओर संकेत करती है।
3.2 स्वामी शिवानन्द वामदेव पांड्या: वास्तविक रचयिता
गहन शोध से यह स्थापित होता है कि इस कालजयी आरती के रचयिता स्वामी शिवानन्द वामदेव पांड्या थे, जो गुजरात के सूरत शहर के निवासी थे। उनका जीवनकाल १६वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 17वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में आता है।
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| पूरा नाम | स्वामी शिवानन्द वामदेव पांड्या |
| जन्म स्थान | नागरफलिया, अम्बाजी रोड, सूरत (गुजरात) |
| पिता का नाम | वामदेव हरिहर पांड्या |
| कुल परंपरा | श्रीगौड़ ब्राह्मण (मूलतः वडनगर निवासी) |
| आरती रचना वर्ष | 1601 ईस्वी (संवत 1658) |
| रचना स्थल | मार्कंडेय मुनि आश्रम, मांडवा बुजुर्ग (निकट अंकलेश्वर) |






