विस्तृत उत्तर
युधिष्ठिर ने हिंसा के प्रायश्चित को लेकर बहुत कठोर आत्मग्लानि व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जिन स्त्रियों के पति और भाई-बंधु मारे गए, उनके प्रति जो अपराध उनसे हुआ है, उसे वे गृहस्थों के यज्ञ आदि कर्मों से धो नहीं सकते। उन्होंने दो उदाहरण दिए। जैसे कीचड़ से गंदला जल साफ नहीं किया जा सकता, और मदिरा से मदिरा की अपवित्रता नहीं मिटाई जा सकती, वैसे ही बहुत-से हिंसा-प्रधान यज्ञों से भी एक प्राणी की हत्या का प्रायश्चित नहीं हो सकता। इस कथन में युधिष्ठिर का मन युद्ध की वैधता पर बहस नहीं कर रहा, बल्कि मारे गए लोगों और उनके परिवारों के दुख के सामने अपने अपराध-बोध को व्यक्त कर रहा है।
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