विस्तृत उत्तर
कुंती ने कृष्ण से मोह छुड़ाने की प्रार्थना इसलिए की क्योंकि वह अपने स्वजनों के प्रति गहरी ममता को कृष्ण-प्रेम में बदलना चाहती थी। वह कृष्ण को विश्व के स्वामी, विश्व की आत्मा और विश्वरूप कहकर संबोधित करती है। फिर स्वीकार करती है कि यदुवंशियों और पांडवों में उसकी बड़ी ममता हो गई है। वह कृष्ण से कहती है कि स्वजनों के साथ जोड़े हुए इस स्नेह के दृढ़ फंदे को काट दें। इसके बाद वह अपनी इच्छा स्पष्ट करती है: जैसे गंगा की अखंड धारा समुद्र में गिरती रहती है, वैसे ही उसकी बुद्धि किसी दूसरी ओर न जाकर कृष्ण से निरंतर प्रेम करती रहे। इस प्रार्थना का केंद्र स्वजन-विमुखता नहीं, बल्कि कृष्ण में अनन्य प्रेम है।
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