३३. काला भैरव कपिला केश शाबर मंत्र
$ॐ गुरुजी काला भैरुँ कपिला के श
, काना मदरा, भगवाँ भेस। मार-मार
काली-पुत्र। बारह कोस की मार,
भूताँ हात कलेजी खूँहा गेडिया। जहाँ जाऊँ
भैरुँ साथ। बारह कोस की रिद्धि ल्यावो।
चौबीस कोस की सिद्धि ल्यावो। सूती होय
, तो जगाय ल्यावो। बैठा होय, तो
उठाय ल्यावो। अनन्त के सर की
भारी ल्यावो। गौरा-पार्वती की विछिया ल्यावो।
गेल्याँ की रस्तान मोह, कु वे की पणिहारी
मोह, बैठा बाणिया मोह, घर बैठी बणियानी
मोह, राजा की रजवाड़ मोह, महिला बैठी
रानी मोह। डाकिनी को, शाकिनी को, भूतनी को,
पलीतनी को, ओपरी को, पराई को, लाग
कूँ , लपट कूँ , धूम कूँ , धक्का
कूँ , पलीया कूँ , चौड़ कूँ ,
चौगट कूँ , काचा कूँ , कलवा कूँ ,
भूत कूँ , पलीत कूँ , जिन कूँ ,
राक्षस कूँ , बरियों से बरी कर दे। नजराँ
जड़ दे ताला, इत्ता भैरव नहीं करे , तो
पिता महादेव की जटा तोड़ तागड़ी करे , माता
पार्वती का चीर फाड़ लँगोट करे । चल
डाकिनी, शाकिनी, चौडूँ मैला बाकरा, देस्यूँ मद की
धार, भरी सभा में द्यूँ आने में कहाँ लगाई
बार ? खप्पर में खाय, मसान में लौटे, ऐसे
काला भैरुँ की कू ण पूजा मेटे। राजा मेटे
राज से जाय, प्रजा मेटे दू ध-पूत से जाय,
जोगी मेटे ध्यान से जाय। शब्द साँचा, ब्रह्म वाचा,
चलो मन्त्र ईश्वरो वाचा।$ 4
देवता:
काल भैरव (काली-पुत्र)।
स्रोत:
शाबर तंत्र परंपरा।
प्रयोजन:
इस मंत्र में वर्णित सभी कार्यों की सिद्धि,
जैसे आकर्षण (मोह), रिद्धि-सिद्धि प्राप्ति, नकारात्मक शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी,
भूत, प्रेत, राक्षस) से रक्षा एवं उनका निवारण।
विधि:
यह अनुष्ठान रविवार से प्रारंभ करें। एक
तिकोना पत्थर का टुकड़ा अपने सामने रखें, उस पर तेल और सिंदूर लगाएं। पान
और नारियल अर्पित करें। प्रतिदिन सरसों के तेल का अखंड दीपक जलाएं। ४१ दिनों
तक प्रतिदिन २१ बार इस मंत्र का जप करें। जप के पश्चात् छार, छारिला, कपूर,
केसर और लौंग की धूप दें। भोग के लिए बाकला, बाटी बाकला (अथवा उड़द के
पकोड़े, बेसन के लड्डू, और गुड़ मिला दूध) रखें।
महत्व:
यह काल भैरव का एक अत्यंत शक्तिशाली
और विस्तृत शाबर मंत्र है, जिसमें विभिन्न प्रकार के प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता है।
इसकी भाषा और क्रियाएं विशिष्ट शाबर परंपरा को दर्शाती हैं।