विस्तृत उत्तर
भैरव साधना की विधि शिव पुराण और शैव-शाक्त तंत्र परंपरा में वर्णित है:
भैरव कौन हैं
शिव पुराण में वर्णित है — भैरव शिव के उग्र अवतार हैं। ब्रह्मा के पाँचवें सिर का वध करने के बाद शिव 'भैरव' रूप में प्रकट हुए। भैरव क्षेत्रपाल हैं — स्थान की रक्षा करते हैं।
भैरव के दो मुख्य रूप
- 1काल भैरव — उग्र रूप; काशी के क्षेत्रपाल
- 2बटुक भैरव — सौम्य रूप; सिद्धि देने वाले
भैरव साधना की भक्ति विधि
1स्नान और काले या नीले वस्त्र
2स्थान
शिव मंदिर या भैरव मंदिर। घर पर भैरव का चित्र या मूर्ति।
3सामग्री
- ▸सरसों तेल का दीप
- ▸लाल पुष्प
- ▸उड़द की दाल (भैरव को प्रिय)
- ▸नारियल
- ▸गुड़
- ▸सुरा (कुछ परंपराओं में) — सात्विक साधना में मिठाई/नारियल
4भैरव मंत्र जप
> 'ॐ बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ॐ'
या
> 'ॐ ह्रीं बटुकाय नमः'
108 बार जप करें।
5काल भैरव अष्टकम् पाठ
आदि शंकराचार्य रचित काल भैरव अष्टकम् — 8 श्लोक:
> 'देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपंकजं, व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।'
6आरती और प्रसाद
भैरव साधना का फल
भैरव की साधना से — शत्रु भय नाश, स्थान की रक्षा, सिद्धि, रोग नाश और काशी में मुक्ति।
काशी में भैरव
काशी (वाराणसी) में काल भैरव मंदिर है — यहाँ भैरव काशी के 'कोतवाल' हैं। काशी में मृत्यु पर शिव स्वयं 'तारक मंत्र' देते हैं — भैरव इसके साक्षी हैं।





