विस्तृत उत्तर
परम सत्य उस परमात्मा को कहा गया है, जिससे जगत की सृष्टि, स्थिति और लय होते हैं। वह सभी सत् पदार्थों में अनुगत है और असत् पदार्थों से अलग है। वह जड़ नहीं, चेतन है; पराधीन नहीं, स्वयंप्रकाश है। वही ब्रह्मा को अपने संकल्प से वेदज्ञान देने वाला है। उसके संबंध में बड़े-बड़े विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। जिस प्रकार तेज, जल और पृथ्वी में भ्रम दिखता है, उसी तरह उसमें त्रिगुणमयी जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति रूप सृष्टि माया से सत्य जैसी प्रतीत होती है। फिर भी वह अपनी स्वयंप्रकाश ज्योति से सदा और सर्वथा माया तथा माया के कार्य से मुक्त है। इसी परम सत्य परमात्मा का ध्यान करने की बात कही गई है।
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