विस्तृत उत्तर
व्याहृति' का अर्थ है ब्रह्मांड का विस्तार। गायत्री मंत्र के आरंभ में आने वाले तीन शब्द (भूः, भुवः, स्वः) त्रिलोक के प्रतीक हैं। स्रुवा को घी से भरकर प्रज्वलित समिधाओं पर इन मंत्रों से चार आहुतियां दी जाती हैं:
— 'ॐ भूरग्नये प्राणाय स्वाहा। इदमग्नये प्राणाय - इदन्न मम॥' (पृथ्वी लोक एवं प्राण वायु के निमित्त)
— 'ॐ भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा। इदं वायवेऽपानाय - इदन्न मम॥' (अंतरिक्ष लोक एवं अपान वायु के निमित्त)
— 'ॐ स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा। इदमादित्याय व्यानाय - इदन्न मम॥' (द्युलोक एवं व्यान वायु के निमित्त)
— 'ॐ भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा। इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः - इदन्न मम॥' (समस्त लोकों और वायु के निमित्त समेकित आहुति)





