श्री विष्णु पुराण: प्रथम अंश – 15 अध्याय का विस्तृत, विशद एवं शुद्ध अनुवाद
प्राचेतसगणों का मारिषा से विवाह और दक्ष प्रजापति की उत्पत्ति का परम पावन वृत्तान्त
यह परम पावन वृत्तान्त श्री विष्णु पुराण के प्रथम अंश के पंद्रहवें अध्याय से उद्धृत है। इस अध्याय में, सृष्टि के विस्तार की कथा एक महत्वपूर्ण मोड़ लेती है, जहाँ तपस्या, प्रकृति के संतुलन, दिव्य संकल्प और मैथुनी सृष्टि के प्रादुर्भाव का गूढ़ समन्वय दर्शित होता है। महर्षि पराशर अपने शिष्य मैत्रेय को प्राचेतसगणों की कथा के अगले चरण का वर्णन करते हैं, जो उनके दीर्घकालीन तप के फल और आगामी प्रजासृष्टि के जनक दक्ष के पुनर्जन्म से सम्बन्धित है।
1. अध्याय का आरम्भ और मैत्रेय द्वारा प्रश्न की पुनरावृत्ति (मैत्रेय-पराशर संवाद)
1.1. प्राचेतसगणों के घोर तप की सफलता का स्मरण
हे द्विजोत्तम मैत्रेय! आपने पूर्व अध्यायों में धर्मनिष्ठ राजा प्राचीनबर्हि के दस पुत्रों, जो सामूहिक रूप से 'प्राचेतस' कहलाते थे, के विषय में विस्तार से श्रवण किया है। उन महातेजस्वी भाइयों ने अपने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए, प्रजा की वृद्धि और सृष्टि के विस्तार के लिए अत्यंत घोर तपस्या का निश्चय किया था।
उन्होंने किसी साधारण स्थान पर नहीं, अपितु गहन सागर के भीतर स्थित नारायण सरोवर में प्रवेश किया और वहाँ एक लाख वर्षों (शतसहस्र वर्षाणि) की अवधि तक एकाग्र चित्त होकर परमपुरुष श्री नारायण की आराधना की। उनकी यह तपस्या इतनी प्रचंड थी कि उसका तेज त्रिलोक में व्याप्त हो गया।
1.2. भगवान श्रीहरि का दर्शन एवं वरदान
जब प्राचेतसगणों की तपस्या पूर्ण हुई और वे सिद्धि के अंतिम सोपान पर पहुँचे, तब स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु उन पर प्रसन्न हुए। भगवान ने अपनी दिव्य, कल्याणकारी छवि द्वारा जल के भीतर ही उन भक्तों को दर्शन दिए। वे करुणासिन्धु, गरुड़ पक्षीराज पर आसीन होकर प्रकट हुए। भगवान के दर्शन पाकर, दसों प्रचेताओं ने अपनी भक्ति भावना से नतमस्तक होकर उन्हें परम श्रद्धा से प्रणाम किया।
तब विष्णु भगवान ने उनसे वर माँगने का आग्रह किया। प्रचेताओं ने उन्हें अपने पिता की आज्ञा (प्रजा की सृष्टि करने की) का वृत्तान्त कह सुनाया, और तदनुसार वर की याचना की। भगवान विष्णु ने उन्हें इच्छित वर प्रदान किया और तत्पश्चात् वे वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए।
1.3. प्राचेतसगणों का स्तव एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि
प्राचेतसगणों ने जो स्तव (स्तुति) भगवान के समक्ष प्रस्तुत की थी, वह उनके विराट स्वरूप और सनातन तत्त्वों के अधिपति के रूप में उनकी महिमा का गुणगान करती है। वे भगवान को समस्त विश्व का आधार मानते हैं।
प्रचेतागणों ने श्रीहरि को सोम (चन्द्रमा) रूप में स्वीकार किया, जिसकी अमृतमयी देह को प्रतिदिन पितृगण और देवगण भोगते हैं, जिससे उन्हें तृप्ति और पोषण प्राप्त होता है। यह एक गहन दार्शनिक सत्य है कि प्राकृतिक शक्तियाँ भी परमेश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं।
इसी प्रकार, वे उन्हें सूर्य स्वरूप श्री नारायण को नमस्कार करते हैं, जो अपने तीक्ष्ण तेज से नभमंडल को आलोकित करते हुए अज्ञान रूपी अंधेरे का नाश कर डालते हैं। वही सूर्य धूप, शीत तथा जल के उद्गम स्थान हैं और उन्हीं की रश्मियों से पृथ्वी पर रस (वनस्पति का सार) ग्रहण किया जाता है, जो अंततः प्राणियों की पुष्टि का कारण बनता है। सूर्य के द्वारा ही पितृगणों का तर्पण होता है, और वे ही देव, पितृ तथा मनुष्यों को तृप्ति प्रदान करते हैं। यह वर्णन दिखाता है कि प्रचेताओं को सृष्टि के पोषण चक्र का गहन ज्ञान था, किन्तु आगे चलकर, जब उनका तेज अनियंत्रित हुआ, तो उन्हें इस ज्ञान को पुनः स्मरण करने की आवश्यकता पड़ी।
1.4. भक्त प्रह्लाद के चरित्र द्वारा भक्ति की पराकाष्ठा का निर्देश
स्तवन के उपसंहार में, प्राचेतसगणों ने भक्तराज प्रह्लाद के चरित्र का गुणगान करके यह सिद्ध किया कि केवल भौतिक तप का तेज ही नहीं, अपितु गोविंदासक्त चित्त ही वास्तविक शक्ति का आधार है। प्रह्लाद का जीवन भक्ति मार्ग के अनुयायियों के लिए एक परम उपमान और प्रेरणा का स्रोत रहा है।
भक्तराज प्रह्लाद परम धर्मात्मा महापुरुष थे, जो सत्य एवं शौर्य आदि सद्गुणों की खान थे। वे समस्त साधु पुरुषों के लिए उपमा स्वरूप थे। उनका चित्त सदैव भगवान गोविंद में आसक्त था, जिसके कारण वे समस्त दैहिक क्लेशों और मायावी शक्तियों के प्रति निर्विकार रहे।
भक्त प्रह्लाद के शौर्य की परीक्षा कई बार हुई:
- निर्विकार भाव से विषपान: दैत्यराज हिरण्यकशिपु के रसोइयों द्वारा लाए गए हलाहल विष को भी उन्होंने निर्विकार भाव से पचा लिया।
- दिग्गजों का मद चूर्ण: दैत्येंद्र द्वारा उन्हें नष्ट करने के लिए आक्रमण हेतु नियुक्त किए गए उन्मत्त दिग्गजों के दांत भी उनके वक्षस्थल में लगने से टूट गए, और उन दिग्गजों का सारा मद पूर्णतः चूर्ण हो गया।
- कृत्या का निष्फल होना: पूर्व काल में दैत्यराज के पुरोहितों द्वारा उत्पन्न की गई विनाशकारी कृत्या (जादू से उत्पन्न शक्ति) भी गोविंद में आसक्त चित्त वाले भक्तराज के अंत का कारण नहीं बन सकी।
- शम्बरासुर की माया का विनाश: अति मायावी शम्बरासुर की हजारों मायाएं भी उनके ऊपर प्रयुक्त किए जाने पर श्री कृष्ण चंद्र (विष्णु) के चक्र से व्यर्थ हो गईं।
यह दिखाता है कि प्रह्लाद समस्त प्राणियों के प्रति समान चित्त रखते थे, और अपने समान ही दूसरों के लिए भी परम प्रेम युक्त थे। प्रचेताओं द्वारा प्रह्लाद की इस कथा का स्मरण करना, उन्हें यह संकेत देता है कि सृष्टि का कार्य केवल तेज या बल से नहीं, अपितु समान चित्त और परम प्रेम से ही संचालित होना चाहिए। यह शिक्षा आगे चलकर उनके अपने क्रोध को शांत करने में सहायक सिद्ध हुई।
2. प्रचेताओं का क्रोध एवं वनस्पति जगत् का संहार
2.1. जल से प्रस्थान और पृथ्वी पर प्रजासृष्टि में बाधा
जब भगवान विष्णु उन्हें वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए, तब दसों प्राचेतसगण जल के गहन समुद्र से बाहर निकलकर पृथ्वी पर आए। उनका उद्देश्य अपने पिता राजा प्राचीनबर्हि की आज्ञा का पालन करना और सृष्टि का विस्तार करना था।
किन्तु पृथ्वी पर आते ही उन्होंने एक विचित्र और निराशाजनक स्थिति का अनुभव किया। लम्बे समय से प्रजापतियों द्वारा सृष्टि विस्तार पर ध्यान न दिए जाने के कारण, और मैथुनी सृष्टि का प्रवर्तन न होने के कारण, पृथ्वी पूरी तरह से वनस्पतियों से आच्छादित हो चुकी थी। वृक्षों और लताओं का आवरण इतना घना और सघन था कि सामान्य प्रजाओं (मनुष्य, पशु आदि) के लिए चलने-फिरने, विचरण करने अथवा निवास करने के लिए कोई स्थान ही नहीं बचा था। यह अत्यधिक वनस्पति पुरानी, अनियंत्रित अयोनिज सृष्टि का प्रतीक थी, जिसने नवीन प्रजा के उदय के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया था।
2.2. क्रोध की उत्पत्ति और संहार का संकल्प
तपस्या के कारण प्राचेतसगणों में अत्यधिक प्रचंड तेज संचित हो चुका था। जब उन्होंने देखा कि ये विशालकाय वृक्ष उनकी प्रजासृष्टि के कार्य में प्रत्यक्ष बाधा उत्पन्न कर रहे हैं, तो उनका क्रोध असहनीय हो उठा। उनका यह क्रोध वस्तुतः उनके एक लाख वर्षों के संचित तपोबल का विनाशकारी रूप था, जो बाधक तत्त्वों को हटाकर सृष्टि के लिए मार्ग प्रशस्त करने हेतु अनिवार्य हो गया था।
महातेजस्वी प्रचेताओं ने तब यह निश्चय किया कि वे सर्वप्रथम इन बाधक वनस्पतियों का समूल नाश करेंगे, तत्पश्चात् ही वे पिता की आज्ञानुसार प्रजा की सृष्टि कर पाएँगे।
2.3. अग्नि और वायु का आवाहन तथा महाप्रलय
क्रोध से प्रज्वलित होकर, दसों प्रचेताओं ने अपने मुख से अग्नि और वायु का आह्वान किया। यह अग्नि उनके तपोबल और क्रोध की शक्ति से उत्पन्न हुई थी।
- इस प्रचण्ड अग्नि ने भयंकर वायु की सहायता प्राप्त की।
- दोनों के संयुक्त बल से समस्त वनस्पति जगत् को जलाना प्रारंभ कर दिया गया।
- यह दृश्य अत्यंत भयंकर था, जो अल्पकाल के लिए प्रलय के समान प्रतीत होने लगा।
प्रचेताओं के क्रोध की ज्वाला इतनी तीव्र थी कि उसने पृथ्वी पर स्थित अधिकतर वृक्षों को भस्म कर डाला, और सृष्टि के इस भाग में वृक्षों का नाश होने लगा। यह घटना सृष्टिक्रम में शुद्धि और परिवर्तन की अनिवार्यता को दर्शाती है, जहाँ पुरानी, अनियंत्रित व्यवस्था को नई, प्रबंधित व्यवस्था के लिए स्थान खाली करना पड़ा।
3. वनस्पति राज सोम (चन्द्रमा) का हस्तक्षेप एवं उपदेश
जब प्रचेताओं के क्रोध से उत्पन्न अग्नि और वायु के प्रचंड प्रकोप से वनस्पति जगत् का अधिकांश भाग जलकर नष्ट हो गया और केवल थोड़े से वृक्ष ही शेष रह गए, तब समस्त वृक्षों के राजा, स्वयं सोम (चन्द्रमा) प्रचेताओं के पास आए।
3.1. सोम का शांति संदेश और प्रजापति धर्म का स्मरण
वनस्पति के राजा सोम ने इस भयंकर प्रलयकारी दृश्य को देखा और करुणा से द्रवित होकर प्रजापति प्रचेताओं को संबोधित किया। सोम ने उनसे शांत होने का अनुरोध किया।
सोम ने कहा, "हे नृपतिगण! आप अपना प्रचण्ड क्रोध शांत कीजिये। यह विनाशकारी कृत्य आपके प्रजापति धर्म के सर्वथा विपरीत है, क्योंकि प्रजापति का कार्य प्रजा का पालन करना है, न कि उसका संहार। मैं आपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक श्रवण करें। मेरा उद्देश्य है कि मैं वृक्षों के साथ आप लोगों की मैत्रीपूर्ण संधि करा दूँगा।"
उन्होंने प्रचेताओं को यह भी समझाया कि वृक्ष भी सृष्टि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आवश्यक अंग हैं। वे समस्त प्राणियों के जीवन और पोषण के लिए भोजन तथा आश्रय प्रदान करते हैं। सोम ने उन्हें अपने क्रोध को संयमित करने, शेष प्रजा (वृक्षों सहित) की रक्षा करने और परमपिता भगवान श्रीहरि की बनाई हुई सृष्टि की व्यवस्था को समझने की सलाह दी।
3.2. सोम द्वारा कन्या मारिषा का समर्पण
क्रोध शांत करने के उपदेश के पश्चात्, सोम ने प्रचेताओं को बताया कि किस प्रकार वे सृष्टि के विस्तार के कार्य में उनकी सहायता कर सकते हैं।
सोम ने उनसे कहा कि उन्होंने भविष्य में होने वाले सृष्टि परिवर्तन को पहले से ही जान लिया था। इसी कारण उन्होंने वृक्षों से उत्पन्न हुई एक अत्यंत सुंदर रूप वाली, रत्नस्वरूपा कन्या को अपनी अमृतमयी, पोषणकारी किरणों से दीर्घकाल तक पाला और पोषित किया है।
सोम ने प्रचेताओं को सृष्टि के दिव्य विधान की पूर्ति का मार्ग सुझाते हुए कहा: "अतः हे प्रचेतागणों! आप इस दिव्य शक्ति संपन्न एवं रूप-सुषमा की साकार प्रतिमा कन्या मारिषा का धर्मानुसार वरण करें। इस कन्या के साथ संयुक्त होने पर, आप निश्चय ही परम तेजस्वी एवं सुयोग्य संतान प्राप्त कर सकेंगे और अपने पिता द्वारा दी गई सृष्टि विस्तार की आज्ञा को पूर्ण कर सकेंगे।"
सोम का यह हस्तक्षेप केवल क्रोध शांत करने तक सीमित नहीं था, अपितु यह दर्शाता था कि नई, मैथुनी सृष्टि को अब केवल शुष्क तप के तेज से नहीं, बल्कि प्रकृति के पोषणकारी तत्त्व (सोम की अमृत किरणें) के समन्वय से आगे बढ़ना था।
4. मारिषा कन्या की उत्पत्ति का गूढ़ वृत्तान्त (अयोनिजा सर्ग)
सोम ने प्रचेताओं को जिस कन्या मारिषा को सौंपा, उसकी उत्पत्ति अत्यंत अलौकिक और प्रकृति के तत्वों के संयोग से हुई थी। यह कथा सृष्टि के अयोनिजा सर्ग के अंतिम चरण को समझाती है।
4.1. महर्षि कण्डू और अप्सरा प्रम्लोचा का प्रसंग
सोम ने कथा सुनानी आरम्भ की कि पूर्वकाल में महर्षि कण्डू नामक एक अत्यंत तेजस्वी ऋषि थे, जो गहन तपस्या में लीन थे। उनकी तपस्या की प्रचंडता से भयभीत होकर देवराज इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा प्रम्लोचा को भेजा। प्रम्लोचा ने अपने अद्भुत सौंदर्य और मोहक माया से मुनि को मोहित कर लिया।
मुनि कण्डू, अपनी तपस्या को क्षण भर के लिए विस्मृत करके, उस अप्सरा के साथ रमण में आसक्त हो गए। वे दोनों दीर्घकाल तक उस आश्रम में निवास करते रहे।
4.2. कालभ्रम का प्रभाव और तपस्या का भंग
मुनि कण्डू मोह के प्रभाव में इतने विलीन हो गए थे कि उन्हें बाहरी संसार या समय के बीतने का कोई भान नहीं रहा। एक समय, जब मुनि को कुछ चेतना लौटी, तो उन्होंने भयभीत होकर विशालाक्षी प्रम्लोचा से पूछा, "अरी भीरु! यह सत्य बताओ कि तुम्हारे साथ रमण करते हुए मुझे कितना समय व्यतीत हो गया है?
प्रम्लोचा ने तब मुनि को सत्य से अवगत कराया। उसने कहा कि इस रमण में अबतक नौ सौ सात वर्ष, छः महीने और तीन दिन का समय व्यतीत हो चुका है। यह सुनकर मुनि को पहले विश्वास नहीं हुआ और उन्हें लगा कि प्रम्लोचा परिहास कर रही है। किन्तु जब उन्हें वास्तविकता का ज्ञान हुआ, तो उन्हें अपनी तपस्या के नष्ट होने का अत्यंत पश्चात्ताप और क्रोध हुआ। उन्होंने तत्काल उस अप्सरा को वहाँ से चले जाने का आदेश दिया।
4.3. गर्भ का स्वेद रूप में निस्सरण
मुनि से आज्ञा प्राप्त कर, प्रम्लोचा अप्सरा स्वर्ग की ओर प्रस्थान करने लगी। वह आकाश मार्ग में तीव्र गति से जाती हुई, मुनि के तेज से उत्पन्न हुए गर्भ को अपने शरीर में धारण नहीं कर सकी। नौ सौ वर्षों के तप के संसर्ग से उत्पन्न हुआ वह गर्भ, उसके शरीर के छिद्रों से पसीने (स्वेद) के श्वेत बिन्दुओं के रूप में बाहर निकल आय।
स्वर्ग लौटते हुए, प्रम्लोचा ने उन श्वेत (स्वेद) बिन्दुओं को वृक्षों के पत्तों से पोंछना चाहा, और इस प्रकार वह गर्भ वृक्षों के पत्तों द्वारा ग्रहण कर लिया गया।
4.4. तत्त्वों द्वारा मारिषा का निर्माण (अयोनिजा उत्पत्ति)
मुनि कण्डू के तेज और प्रम्लोचा के स्वेद से निर्मित उस भ्रूण को, विभिन्न प्राकृतिक तत्त्वों ने मिलकर एक पूर्ण कन्या के रूप में रूपांतरित किया। यह प्रक्रिया मारिषा को 'अयोनिजा' का विशिष्ट दर्जा प्रदान करती है:
- वृक्ष (वनस्पति): वृक्षों के पत्तों ने मुनि के तेज और अप्सरा के स्वेद के उन बिंदुओं को इकट्ठा किया और ग्रहण किया।
- वायु (पवन देव): वायु देव ने उन समस्त एकत्रित स्वेद बिन्दुओं को एक स्थान पर संकेंद्रित करके, उन्हें एक गर्भ का रूप दिया।
- चन्द्रमा (सोम): अंत में, वनस्पतियों के राजा चन्द्रमा (सोम) ने अपनी अमृतमयी और पोषणकारी किरणों का उपयोग करके उस गर्भ का धीरे-धीरे पालन-पोषण किया और उसे पुष्ट किया।
इसी विलक्षण, बहु-तत्त्वीय प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, मारिषा नामक कन्या की उत्पत्ति हुई। वह कन्या 'वृक्षों की पुत्री' भी कहलाई, और उसके नेत्र बड़े मनोहर थे। यह कन्या ही बाद में प्राचेतसगणों की पत्नी बनी।
मारिषा की अयोनिजा उत्पत्ति में सहायक प्रमुख तत्त्व
| सहायक तत्त्व (कारक) | योगदान का स्वरूप | उत्पत्ति में भूमिका का सार |
|---|---|---|
| महर्षि कण्डू का तेज | गर्भाधान का मूल तेज | 108 वर्षों के तप का भौतिक अवशेष (स्वेद रूप में निर्गत)। |
| अप्सरा प्रम्लोचा का स्वेद | गर्भ का भौतिक आधार/वाहन | मुनि के साथ मोह के कारण देह से त्यागा गया। |
| वृक्षों के पत्ते | स्वेद बिन्दुओं का संग्रह | उस समय के सृजन चक्र का आधारभूत योगदान। |
| वायु देव | भ्रूण का एकत्रीकरण | तत्त्वों का संयोजन कर गर्भ को आकृति प्रदान करना। |
| चन्द्रमा (सोम) | पोषण एवं पुष्टीकरण | मारिषा को जीवनशक्ति, रूप और दिव्य तेज से संपन्न करना 8। |
5. मारिषा का पूर्व जन्म वृत्तान्त और श्री विष्णु का वरदान
सोम ने प्रचेताओं को मारिषा के केवल वर्तमान जन्म की विलक्षणता ही नहीं बताई, अपितु उसके पूर्व जन्म के पुण्यकर्म और स्वयं भगवान विष्णु द्वारा दिए गए वरदान के महत्त्व को भी समझाया।
5.1. पूर्व जन्म का वृत्तान्त और दुखमय जीवन
सोम ने वर्णन किया कि मारिषा कोई साधारण कन्या नहीं है, अपितु वह दिव्य शक्ति से संपन्न साध्वी है। अपने पूर्व जन्म में वह एक राज्य की महारानी थी। अपने जीवन काल में वह परम साध्वी, कुलीन और गुणवती थी, किन्तु देव प्रकोप के कारण वह पुत्र प्राप्त नहीं कर पाई थी। दुर्भाग्यवश, अल्पायु में ही उसके पति की मृत्यु हो गई, और वह युवावस्था में ही विधवा होकर गहन दुःख का भाजन बनी।
पति और पुत्र से विहीन होने के कारण, उस व्यथित नारी के मन में तीव्र वैराग्य और भक्ति का उदय हुआ।
5.2. विष्णु की परम आराधना और वरदान की प्राप्ति
विधवा होने के पश्चात्, उस साध्वी रानी (जो भविष्य में मारिषा बनी) ने अपने भक्ति भाव से परमपुरुष भगवान श्री विष्णु की अत्यंत घोर पूजा-अर्चना और तपस्या की। इस प्रकार उन्होंने श्रीहरि को प्रसन्न करने का प्रयास किया।
उनकी अगाध भक्ति से संतुष्ट होकर, भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और उस पति-पुत्र हीन व्यथित नारी के मन को प्रसन्न करने के लिए, उन्हें मनोवांछित वर मांगने का अनुग्रह किया।
5.3. मारिषा द्वारा मांगे गए विशिष्ट वरदान
साध्वी मारिषा ने भगवान विष्णु से अत्यंत महत्वपूर्ण वरदान माँगे, जो सीधे तौर पर सृष्टि के अगले चरण को निर्धारित करने वाले थे:
- उत्तम पति की प्राप्ति: उसने वर माँगा कि उसे जन्म-जन्मांतर तक सदैव परम प्रशंसनीय, सुखकारी और सर्वश्रेष्ठ पति प्राप्त हों।
- तेजस्वी पुत्र की याचना: उसने ऐसे पुत्र की प्राप्ति का वर माँगा, जो स्वयं प्रजापति के समान तेजों में हो, और सृष्टि विस्तार में समर्थ हो (एक प्रकार से ब्रह्मा जी जैसा पुत्र)।
- अयोनिजा स्वरूप: स्वयं के लिए, उसने 'अयोनिजा' (बिना योनि/गर्भ के उत्पन्न होने वाली), नित्य सौंदर्य की प्रतिमा, कुलीना तथा असीम गुणवती होने का वर प्राप्त किया। यह वरदान उसकी भावी जन्म की शुद्धता और दिव्य उत्पत्ति के लिए आवश्यक था।
5.4. वरदान का फल: बहु-पतित्व का विधान
भगवान विष्णु ने साध्वी मारिषा को आश्वासन दिया कि उन्हें तेजस्वी पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। साथ ही, उन्होंने यह विधान किया कि उसे एक ही जीवन में कई अच्छे पति प्राप्त होंगे।
सोम ने प्रचेताओं को समझाया कि यह संयोग केवल भाग्यवश नहीं है, अपितु यह भगवान विष्णु के वरदान का प्रत्यक्ष फल है। मारिषा का एक साथ दस प्रचेताओं के साथ विवाह होना, इसी वरदान की पूर्ति है। दसों प्रचेताओं का सामूहिक, प्रचंड तपस्वी तेज ही विष्णु के वरदान से दक्ष प्रजापति के समान महातेजस्वी पुत्र को उत्पन्न करने की क्षमता रखता था। इस प्रकार, मारिषा का पूर्व जन्म का भक्तिपूर्ण संकल्प, सृष्टि के एक महान मोड़ को साधने का दिव्य साधन बन गया।
6. प्रचेताओं का मारिषा से विवाह एवं दक्ष प्रजापति की उत्पत्ति
6.1. क्रोध का शमन और मैत्री की पुनर्स्थापना
वनस्पतियों के राजा सोम द्वारा सुनाए गए इस परम पावन वृत्तान्त, मारिषा की दिव्य उत्पत्ति के रहस्य, और स्वयं विष्णु के वरदान का विवरण सुनकर, प्रचेताओं का संचित क्रोध तत्काल और पूर्ण रूप से शांत हो गया 8।
उन्होंने तत्काल अपने मुख से उत्पन्न की गई वायु एवं अग्नि के निश्वसन (जो वृक्षों को भस्म कर रहा था) को रोक दिया। इस प्रकार, उन्होंने क्रोध का त्याग कर दिया और वनस्पति जगत् के साथ अपनी मैत्री को पुनः स्थापित कर लिया, जिससे पृथ्वी पर संतुलन बहाल हुआ।
6.2. धर्मानुसार पाणिग्रहण
इसके पश्चात्, चन्द्रमा (सोम) ने उस दिव्य गुणों से संपन्न, रूप-सुषमा की आकर कन्या मारिषा को दसों प्रचेताओं को सौंप दिया, और वे स्वयं वहाँ से चले गए।
दसों महातेजस्वी प्रचेताओं ने अपने पिता की आज्ञा और विष्णु के वरदान की पूर्ति हेतु धर्मानुसार उस कन्या मारिषा का पाणिग्रहण संस्कार किया। यह विवाह प्रजा की वृद्धि हेतु तपस्वी तेज और दिव्य शक्ति का सम्मिलन था।
6.3. दक्ष प्रजापति का पुनर्जन्म
दसों परम तपस्वी प्राचेतसगणों के संयुक्त, प्रचण्ड तपोमय तेज और मारिषा के दिव्य, विष्णु वरदान युक्त गुणों के संयोग से, कालान्तर में एक महातेजस्वी पुत्र की उत्पत्ति हुई।
यह पुत्र और कोई नहीं, अपितु दक्ष प्रजापति थे। पूर्व जन्म में दक्ष ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, परन्तु भगवान शिव के अपमान के कारण उन्हें अपने पद और शरीर से च्युत होना पड़ा था। इस जन्म में उन्होंने प्राचेतस दक्ष के नाम से जन्म लिया, जो सृष्टि के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए एक अटल और स्थिर शक्ति प्रदान करने हेतु अनिवार्य था। इस प्रकार, मारिषा, प्राचेतसगणों की पत्नी बनी और दक्ष की जननी हुई।
7. मैथुनी सृष्टि का प्रवर्तन और दक्ष का योगदान
दक्ष प्रजापति का यह पुनर्जन्म सृष्टि के इतिहास में एक मौलिक परिवर्तन का प्रतीक है, क्योंकि उन्होंने पहली बार प्रजनन के माध्यम से सृष्टि को विस्तार दिया।
7.1. मैथुनी सृष्टि का अवलोकन और आवश्यकता
प्राचेतस दक्ष ने सृष्टिकार्य को आगे बढ़ाते हुए पूर्व के सृजन क्रम का अवलोकन किया। उन्होंने पाया कि ब्रह्मा तथा मरीचि आदि प्रजापतियों द्वारा मन, संकल्प अथवा योगबल से जो अयोनिज सृष्टि (मानसिक सृजन) की जा रही थी, उसमें वंश परम्परा का पर्याप्त वर्द्धन नहीं हो पा रहा था। यह संकल्प आधारित सृष्टि धीमी थी और उसमें स्थिरता का अभाव था।
सृष्टि की जनसंख्या और स्थायित्व को बढ़ाने के लिए एक नए, अधिक प्रभावी तंत्र की आवश्यकता थी।
7.2. मैथुनी सृष्टि का प्रवर्तन
इस समस्या के निवारण हेतु, दक्ष प्रजापति ने सृष्टि विस्तार के लिए एक मौलिक और अभूतपूर्व परिवर्तन प्रस्तुत किया। उन्होंने सबसे पहले चार पैर वाले प्राणियों, दो पैर वाले जीवों (मनुष्य और पक्षियों), और अन्य प्रकार के जीवों की रचना की।
इसके पश्चात्, सृष्टि में वंश परम्परा को स्थायी रूप से आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने स्त्रियों की रचना की। इस प्रकार, दक्ष प्रजापति ने इस युग में मैथुनी सृष्टि (लैंगिक प्रजनन) का प्रवर्तन किया। दक्ष प्रजापति को इस प्रकार मैथुनी सृष्टि के जन्मदाता के रूप में जाना जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मानव जाति तथा अन्य प्रजाओं की संख्या (कुल) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और सृष्टि का विस्तार तीव्र गति से होने लगा।
मैथुनी सृष्टि का परिवर्तन
| सृष्टि का पूर्व चरण (अयोनिज) | सृष्टि का नूतन चरण (मैथुनी) |
|---|---|
| जनक: ब्रह्मा के मानस पुत्र आदि प्रजापति। | जनक: दक्ष प्रजापति (प्राचेतस) और मारिषा। |
| प्रक्रिया: संकल्प, मनस या योगबल द्वारा। | प्रक्रिया: लैंगिक प्रजनन (मैथुन)। |
| परिणाम: प्रजा का वर्द्धन अपर्याप्त और धीमा था। | परिणाम: प्रजा की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि और वंश परम्परा का स्थायी विस्तार। |
7.3. दक्ष के पुत्रों का विरक्ति मार्ग
दक्ष ने सृष्टि की शुरुआत में पंचजन की पुत्री असिक्री से हर्यश्व नामक दस हजार पुत्र उत्पन्न किए, जिनका उद्देश्य सृष्टि का विस्तार करना था।
परन्तु, देवर्षि नारद मुनि ने उन हर्यश्वों को तपस्या करते हुए देखा। नारद जी ने विचार किया कि यद्यपि उनकी बुद्धि भगवान में लग गई है, फिर भी वे पिता की आज्ञा के कारण संतान उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे हैं। नारद ने उन्हें मोक्ष प्राप्त करने का उपदेश दिया और उन्हें समझाया कि पृथ्वी लोक पर माया की मजदूरी करने के बजाय मोक्ष प्राप्त करना ही श्रेष्ठ है।
नारद की विचित्र और रहस्यमय बातें सुनकर, हर्यश्वों को विरक्ति उत्पन्न हो गई और वे मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हो गए।
दक्ष प्रजापति ने पुन: सृष्टि बढ़ाने के लिए शबलाश्व नामक अन्य पुत्रों को उत्पन्न किया और उन्हें भी तप करने के लिए नारायण सरोवर पर भेजा, जहाँ उनके बड़े भाइयों ने सिद्धि प्राप्त की थी। परन्तु नारद जी ने इन शबलाश्वों को भी कूटवचन में उपदेश देकर विचलित कर दिया। शबलाश्व भी अपने भाइयों के समान मोक्ष प्राप्त करने के लिए निकल पड़े।
7.4. दक्ष द्वारा नारद को शाप
जब दक्ष प्रजापति को ज्ञात हुआ कि नारद ने उनके दस हजार हर्यश्व पुत्रों और बाद में शबलाश्व पुत्रों को भी मोक्ष का मार्ग दिखाकर उनके वंश परंपरा का विच्छेद कर दिया है, तो वे देवर्षि नारद पर अत्यंत क्रोधित हो गए।
क्रोधित दक्ष ने नारद जी से कहा, "अरे दुष्ट! तुमने झूठ-मूठ का साधुओं जैसा वेश धारण कर रखा है। हमारे भोले-भाले बालकों को भिक्षुकों का मार्ग पकड़ाकर तुमने हमारा घोर अपकार किया है!"
दक्ष ने नारद को शाप देते हुए कहा: "हे नारद! तुमने हमारी वंश परंपरा का विच्छेद किया है, इसलिए तुम अब लोक-लोकांतरों में भटकते रहो! तुम्हारे लिए ठहरने का कहीं भी कोई ठौर नहीं होगा।" नारद मुनि ने इस शाप को सहर्ष स्वीकार किया और "बहुत अच्छा" कहकर वहाँ से प्रस्थान कर गए ।
दक्ष का यह तीव्र स्वभाव यह दर्शाता है कि सृष्टि का कार्य (प्रवृत्ति मार्ग) और मोक्ष का मार्ग (निवृत्ति मार्ग) परस्पर विरोधी होते हैं। दक्ष, प्रजापति होने के नाते, प्रवृत्ति मार्ग को बनाए रखने के लिए किसी भी हस्तक्षेप को सहन नहीं कर सकते थे।
7.5. दक्ष की साठ कन्याओं का वितरण
अपने पुत्रों के विरक्त हो जाने के पश्चात्, दक्ष ने सृष्टि के विस्तार के लिए मैथुनी सृष्टि को और अधिक सशक्त बनाने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी पत्नी असिक्री (या वीरिणी) से साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं।
दक्ष ने इन साठ कन्याओं को विभिन्न देवताओं और ऋषियों को प्रदान किया, जिनसे आगे चलकर देव, दैत्य, मानव, गंधर्व, अप्सरा आदि समस्त प्रजाओं का जन्म हुआ 7।
कन्याओं का प्रमुख वितरण:
- दस कन्याएँ धर्म को प्रदान की गईं।
- तेरह कन्याएँ महर्षि कश्यप को दी गईं। इन तेरह कन्याओं में अदिति, दिति, दनु, काल, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विंता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रु, और मुनि प्रमुख थीं।
- सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा (सोम) को दी गईं। ये कन्याएँ ब्रह्माण्ड में नक्षत्रों के रूप में प्रसिद्ध हुईं। यह ध्यान देने योग्य है कि सोम एक ओर मारिषा के पालक और पिता स्वरूप थे, और दूसरी ओर वे दक्ष के जामाता भी बने।
- शेष कन्याओं में चार अरिष्टनेमि को, दो अंगिरा को और दो कृष्ण को दी गईं।
इन कन्याओं के गर्भ से ही देव, पक्षी, गौ, गन्धर्व-अप्सरा आदि समस्त चल-अचल प्राणियों ने जन्म लिया, जिससे सृष्टि का विस्तार पूर्ण रूप से संपन्न हुआ।
8. अध्याय का उपसंहार: दार्शनिक निष्कर्ष एवं सृष्टि का विधान
श्री विष्णु पुराण का यह पंद्रहवां अध्याय सृष्टि की उत्पत्ति के गूढ़ सिद्धांतों, तपस्या के बल, मोह की माया, और अंततः परम पुरुष श्री विष्णु के अटूट विधान को अत्यंत स्पष्टता से प्रस्तुत करता है।
8.1. तपस्या, मोह और कालभ्रम का स्वरूप
महर्षि कण्डू और अप्सरा प्रम्लोचा का प्रसंग यह दार्शनिक सत्य स्थापित करता है कि भौतिक तपस्या से संचित शक्ति भी मन में उत्पन्न होने वाली आसक्ति (मोह) के सामने क्षणभंगुर सिद्ध हो सकती है। कण्डू मुनि का नौ सौ सात वर्षों के काल को भी क्षण मात्र मानना, माया के प्रचंड और भ्रामक प्रभाव को दर्शाता है। यह कथा सभी साधकों को सचेत करती है कि लक्ष्य से विचलित होने के लिए केवल एक कमजोर पल पर्याप्त होता है।
दूसरी ओर, यह प्रसंग मारिषा की अयोनिजा उत्पत्ति का आधार बना, जो यह सिद्ध करता है कि मोह से उत्पन्न शक्ति भी यदि दिव्य तत्त्वों (वायु, सोम, वृक्ष) के संयोजन से शुद्ध हो जाए, तो वह सृष्टि के महान कार्य में उपयोगी बन सकती है।
8.2. विष्णु भक्ति की श्रेष्ठता और दिव्य योजना
प्रचेताओं की कथा और मारिषा का पूर्व जन्म का वृत्तान्त यह दिखाता है कि सभी घटनाओं के पीछे भगवान श्रीहरि की परम कल्याणकारी योजना कार्यरत रहती है 8। मारिषा की निष्काम भक्ति ने उसे ऐसा वरदान दिलाया, जो उसके व्यक्तिगत दुख (विधवापन, पुत्रहीनता) का निवारण करने के साथ-साथ, सृष्टि के एक महान मोड़ (मैथुनी सृष्टि का आरंभ) को साधने का साधन भी बना।
स्तवन में भक्तराज प्रह्लाद का उदाहरण बार-बार यह सिद्ध करता है कि वास्तविक शक्ति भौतिक तेज या मायावी सामर्थ्य में नहीं है, अपितु गोविंदासक्त चित्त में है। भक्त को काल, विष, कृत्या या प्रचंड दैत्येंद्र की शक्ति भी नष्ट नहीं कर सकती।
8.3. सृष्टि के नियामक श्रीहरि का परमार्थ स्वरूप
इस सम्पूर्ण अध्याय में, चाहे वह प्रचेताओं का प्रचंड क्रोध हो, सोम का संतुलनकारी उपदेश हो, या दक्ष का मैथुनी सृष्टि का प्रवर्तन हो, इन सभी जटिल क्रियाओं के पीछे एक ही परम सत्ता का विधान कार्य करता है।
शास्त्रीय दृष्टिकोण से, भगवान विष्णु ही विश्व के परम अधिष्ठान हैं। वे अतिसूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं, समस्त प्राणियों में स्थित पुरुषोत्तम हैं, और अविनाशी हैं। परमार्थतः (वास्तव में) वे निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, किन्तु अज्ञान के कारण वही एक सत्ता नाना पदार्थ रूप से प्रतीत होती है। वे ही काल-स्वरूप को धारण करके जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और अंततः संहार करने में समर्थ हैं।
दक्ष प्रजापति का दस महातपस्वी पिताओं के तेज से पुनर्जन्म होना, और उनके द्वारा वंश परम्परा को स्थिर करना, यह सिद्ध करता है कि भगवान की व्यवस्था में हर कार्य एक निश्चित उद्देश्य से संपन्न होता है। यह कथा सृष्टि के विस्तार की अनिवार्यता, प्रकृति के नियमों और अंततः भागवत धर्म की सर्वोच्चता को दर्शाती है।






