विस्तृत उत्तर
मंदिर में वस्त्र दान दो प्रकार से होता है — देवता को वस्त्र अर्पण और निर्धनों को वस्त्र दान। दोनों ही अत्यन्त पुण्यदायक हैं।
शास्त्रीय महत्व
1देवता को वस्त्र अर्पण
विष्णुपुराण: देवता को नवीन वस्त्र अर्पित करना षोडशोपचार पूजा का अंग है। यह देवता की सेवा और सम्मान का प्रतीक है। देवता को वस्त्र = अपनी आत्मा को ईश्वर में ढकना (प्रतीकात्मक)।
2निर्धन/दरिद्र को वस्त्र दान
पद्मपुराण: 'वस्त्रदानं महापुण्यं लोके ख्यातिकरं परम्।' — वस्त्र दान = महापुण्य। नग्न/निर्धन को वस्त्र देना = लज्जा-रक्षा = परम पुण्य।
3भागवतपुराण
भगवान कृष्ण ने सुदामा के फटे वस्त्र देखकर उन्हें सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान किया — वस्त्र-दीनता = भगवान की करुणा का आवाहन।
वस्त्र दान कब-कहाँ
- ▸मंदिर में देवता को — नवीन रेशमी/सूती वस्त्र (पूजा-उत्सव पर)
- ▸मंदिर परिसर में निर्धनों को — सर्दी/त्योहारों पर
- ▸संक्रांति (मकर संक्रांति) — वस्त्र दान विशेष शुभ
- ▸ग्रहण काल — दान विशेष पुण्यदायक
- ▸श्राद्ध पक्ष — ब्राह्मण/पुरोहित को
वस्त्र दान के नियम
- ▸नवीन और स्वच्छ वस्त्र दान करें — फटे/पुराने/मैले नहीं
- ▸श्रद्धा और सम्मान से दें — दया भाव से नहीं
- ▸देवता को वस्त्र — देवता-अनुकूल रंग (विष्णु=पीला, शिव=श्वेत, देवी=लाल)
- ▸वस्त्र दान के साथ फल/मिठाई भी दें तो अतिरिक्त शुभ
फल
- ▸सौन्दर्य और यश प्राप्ति
- ▸लक्ष्मी कृपा
- ▸अगले जन्म में उत्तम वस्त्र/ऐश्वर्य
- ▸पितर तृप्ति (श्राद्ध में)
- ▸लज्जा-रक्षा का पुण्य = दीर्घकालीन





