विस्तृत उत्तर
वस्त्र अर्पण षोडशोपचार पूजा का सातवाँ उपचार है। देवता को वस्त्र समर्पित करने की परंपरा अति प्राचीन है और इसके पीछे गहरा भाव है।
शास्त्रीय विधान — स्नान के बाद देवता को वस्त्र अर्पित किया जाता है। पुरुष देवताओं (विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि) को यज्ञोपवीत (जनेऊ) और धोती-उत्तरीय (दो वस्त्र) अर्पित किए जाते हैं। देवियों को ओढ़नी, साड़ी या चुनरी अर्पित की जाती है। मंत्र है — 'श्री [देवता के नाम] नमः वस्त्रं समर्पयामि।'
व्यावहारिक रूप — अधिकांश घरों में मूर्ति पर वास्तविक वस्त्र नहीं पहनाए जाते। ऐसे में एक स्वच्छ लाल, पीला या सफेद कपड़े का टुकड़ा मंत्र के साथ अर्पित करके वापस उठा लिया जाता है। यह प्रतीकात्मक अर्पण भी पूर्ण माना जाता है।
वस्त्र अर्पण का भाव यह है कि जैसे हम अपने प्रिय को सुंदर वस्त्र पहनाते हैं, उसी प्रेम-भाव से देवता को भी सुशोभित करते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति देवता को वस्त्र अर्पित करता है उसे उत्तम वस्त्र और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
विशेष अवसरों (नवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी) पर देवता को विशेष वस्त्र पहनाने की परंपरा है।





