विस्तृत उत्तर
शांति पाठ वैदिक परम्परा में सभी धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञों और संस्कारों के आरम्भ और अंत में बोला जाने वाला पवित्र मंत्र-संग्रह है। इसमें समस्त सृष्टि के लिए शांति की कामना की जाती है — द्युलोक से लेकर पृथ्वी, जल, वनस्पति और प्राणिमात्र तक। यह विश्व-कल्याण की वैदिक प्रार्थना है, जो किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की शांति के लिए है।
यजुर्वेद का मुख्य शांति पाठ:
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षँ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वँ शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हिंदी अर्थ: द्युलोक में शांति हो, अन्तरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हो, जल में शांति हो, औषधियों में शांति हो, वनस्पतियों में शांति हो, सभी देवताओं में शांति हो, ब्रह्म में शांति हो, सब में शांति हो, केवल शांति ही शांति हो — वह शांति मुझे भी प्राप्त हो। ॐ शांति, शांति, शांति।
तीन बार शांति इसलिए कही जाती है क्योंकि शांति तीन प्रकार की होती है — आध्यात्मिक (मन की), आधिदैविक (प्राकृतिक शक्तियों की) और आधिभौतिक (बाह्य जगत की)।
बृहदारण्यकोपनिषद् का पवमान मंत्र भी शांति पाठ का भाग है:
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमया। मृत्योर्मामृतं गमय॥
अर्थ: मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।





