विस्तृत उत्तर
पूजा में गंध (सुगंधित द्रव्य) अर्पित करना षोडशोपचार का नौवाँ उपचार है। यह उपचार वस्त्र अर्पण के बाद होता है और इसमें मुख्यतः चंदन, रोली, इत्र और अगरु अर्पित किए जाते हैं।
शास्त्रीय महत्व — 'गंधं विलेपयामि' कहते हुए देवता को गंध (चंदन, रोली, अष्टगंध) लगाई जाती है। शास्त्रों में कहा गया है कि गंध अर्पण से पुण्य की प्राप्ति होती है। सुगन्धित द्रव्य और इत्र अर्पण से यश-कीर्ति का विस्तार होता है।
विभिन्न देवताओं के लिए गंध — भगवान विष्णु को चंदन और अगरु प्रिय हैं। भगवान शिव को चंदन और अष्टगंध अर्पित किया जाता है। देवी को सुगंधित इत्र और गुलाब का अर्क प्रिय है। भगवान कृष्ण को केसर और गोपीचंदन।
गंध का आध्यात्मिक भाव — यह सुगंध पूजा-स्थल के वातावरण को शुद्ध और सात्विक बनाती है। सुगंध मन को शांत करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। पूजा में धूप और गंध साथ मिलाकर देवता का आभास कराते हैं — ऐसी मान्यता है।
व्यावहारिक रूप — सुबह पूजा में देवता पर चंदन का तिलक लगाएँ और साथ में अगरबत्ती या धूप जलाएँ — यह दोनों मिलकर गंध-उपचार की पूर्णता करते हैं।





