विस्तृत उत्तर
षोडशोपचार पूजा में 'स्नान' और 'अभिषेक' दोनों जल-शुद्धि से जुड़े हैं परंतु इनमें भाव, विधि और महत्व का अंतर है।
स्नान — यह षोडशोपचार का छठवाँ उपचार है। यह देवता की प्रतिमा को जल से स्नान कराने की क्रिया है। सामान्य पूजा में शुद्ध जल, गंगाजल या पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शर्करा) से देवता को स्नान कराया जाता है। इसका उद्देश्य देवता की प्रतिमा की बाह्य शुद्धि और मन की प्रसन्नता है। भगवान को स्नान कराने से भक्त की आत्मशुद्धि होती है।
अभिषेक — यह एक विशेष और विस्तृत पूजा-विधि है जो विशेष अवसरों पर की जाती है जैसे महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी, नवरात्रि, मंदिर प्रतिष्ठा आदि। अभिषेक में पंचामृत के अतिरिक्त फलों का रस, इत्र, गुलाबजल, पंचगव्य (गौ-उत्पाद), औषधियाँ आदि अनेक पवित्र द्रव्यों से एक क्रम में स्नान कराया जाता है, प्रत्येक के लिए अलग मंत्र होते हैं। शिवलिंग का जलाभिषेक इसका सर्वाधिक प्रचलित रूप है।
संक्षेप में — स्नान दैनिक पूजा का सरल उपचार है जो देवता की शुद्धि के लिए होता है। अभिषेक एक विशेष, विस्तृत और मंत्रपूर्ण स्नान-यज्ञ है जो विशेष अवसरों पर विशिष्ट फल की प्राप्ति के लिए किया जाता है।





