विस्तृत उत्तर
पूजा के अंत में अपनी भूलों और त्रुटियों के लिए भगवान से क्षमा माँगना एक अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा है। शास्त्रों में यह विधान इस भाव से है कि पूजा-विधि में हमसे जाने-अनजाने में कोई न कोई भूल हो ही जाती है।
सामान्य अपराध-क्षमापन मंत्र:
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥
गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्रयमेव च।
आगताः सुखसंपत्तिः पुण्योऽहं तव दर्शनात्॥'
अर्थ — हे परमेश्वर, दिन-रात मुझसे हजारों अपराध होते हैं। मुझे आप अपना दास समझकर इन्हें क्षमा करें। आपके दर्शन से मेरे पाप, दुख और दरिद्रता दूर हों और सुख-संपत्ति की प्राप्ति हो।
यदि देवी की पूजा हो तो 'परमेश्वर' की जगह 'परमेश्वरी' बोलें।
देवी के लिए आदि शंकराचार्य रचित 'देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र' भी अत्यंत प्रभावशाली है जिसकी पहली पंक्ति है — 'न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो...'
नियम — प्रत्येक पूजा के अंत में यह मंत्र अवश्य बोलें। यह मंत्र मंत्र-जप के बाद भी बोला जा सकता है।





