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भगवान को भोग लगाने का मंत्र?

भोग लगाने का प्रमुख मंत्र है — 'त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।

संक्षिप्त उत्तर

भोग लगाने का प्रमुख मंत्र है — 'त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥' और 'शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च, आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥'

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विस्तृत उत्तर

भगवान को अर्पित किए जाने वाले भोजन को शास्त्रों में 'नैवेद्य' कहा जाता है — 'भोग' वह कहलाता है जो प्रसाद के रूप में भक्तों को वितरित होता है। नैवेद्य अर्पण के लिए निम्नलिखित मंत्र प्रयुक्त होते हैं:

सर्वदेवों के लिए सामान्य नैवेद्य मंत्र:

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।

गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥'

अर्थ — हे परमेश्वर, यह सब आपका ही दिया हुआ है, आपको ही समर्पित करता हूँ। सम्मुख होकर इसे ग्रहण करें और प्रसन्न हों।

नैवेद्य वर्णन मंत्र:

शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।

आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥'

अर्थ — शर्करा, खंड, दही, दूध, घी और अन्य भोज्य पदार्थों से युक्त यह नैवेद्य कृपया स्वीकार करें।

नैवेद्य के मध्य में आचमनीय जल के लिए:

नैवेद्य मध्ये आचमनीयं जलं समर्पयामि।

व्यावहारिक विधि — भोग रखने से पहले घंटी बजाएँ, भोजन के पास तुलसीपत्र रखें, भगवान के सामने पाँच अंगुलियों को मिलाकर मुद्रा बनाते हुए मंत्र बोलते हुए नैवेद्य समर्पित करें। भोग को कम से कम 5-10 मिनट रखें, फिर परिवार में प्रसाद के रूप में वितरित करें।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

भगवान को भोग लगाने का मंत्र को संदर्भ सहित समझें

भगवान को भोग लगाने का मंत्र का सबसे सीधा सार यह है: भोग लगाने का प्रमुख मंत्र है — 'त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥' और 'शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च, आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥'

पूजा विधि एवं कर्मकांड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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