गोवर्धन पूजा: अन्नकूट प्रसाद एवं गिरिराज गोवर्धन पूजन की शास्त्रसम्मत विधि एवं अनुष्ठानिक मीमांसा
सनातन धर्म के विस्तृत वाङ्मय, अनुष्ठानिक परंपराओं और वैष्णव संप्रदायों में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाए जाने वाले गोवर्धन पूजा (अन्नकूट महोत्सव) का अत्यंत विशिष्ट एवं अद्वितीय स्थान है। श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कन्ध), विष्णु पुराण, गर्ग संहिता (गिरिराज खण्ड), और विभिन्न धर्मशास्त्रों में इस पर्व को केवल एक कर्मकाण्डीय अनुष्ठान नहीं, अपितु प्रकृति, परमात्मा और जीव के मध्य तादात्म्य स्थापित करने वाले सर्वोच्च भक्ति-योग के रूप में वर्णित किया गया है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा देवराज इन्द्र के अहङ्कार-मर्दन, सकाम कर्मकाण्ड (इन्द्र-याग) के स्थान पर निष्काम प्रकृति-पूजन (गिरि-याग) की स्थापना, और गिरिराज गोवर्धन की साक्षात् देव-रूप में प्रतिष्ठा के उपरांत इस अनुष्ठान का प्रादुर्भाव हुआ。
यह शोध-प्रबंध पूर्णतः प्रामाणिक स्रोतों—कमलाकर भट्ट कृत 'निर्णयसिन्धु', विश्वनाथ दैवज्ञ कृत 'व्रतराज', श्रीमद्भागवत, और गर्ग संहिता पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य गोवर्धन पूजन की शास्त्रसम्मत विधि, अन्नकूट अर्पण की वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक प्रक्रिया, मंत्र-प्रयोग, परिक्रमा-विधान और व्रत के नियमों का अत्यंत सूक्ष्म, तार्किक और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करना है。
गोवर्धन पर्वत का प्राकट्य एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि
अनुष्ठानिक विवरण में प्रवेश करने से पूर्व, गिरिराज गोवर्धन के प्राकट्य और उनकी शास्त्रीय महत्ता को समझना अनिवार्य है। 'गर्ग संहिता' के गिरिराज खण्ड तथा अन्य वैष्णव तंत्रों के अनुसार, गोवर्धन पर्वत मूलतः गोलोक वृंदावन का मुकुटमणि है, जो पृथ्वी पर अवतरित हुआ है。
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, भारत के पश्चिमी तट पर शाल्मली द्वीप में पर्वतों के राजा द्रोणाचल का निवास था। एक बार पुलस्त्य मुनि वहां आए और उन्होंने द्रोणाचल से उनके पुत्र 'गिरिराज' को अपने साथ काशी ले जाने की मांग की। गिरिराज ने मुनि के साथ जाने की यह शर्त रखी कि मार्ग में जहां भी मुनि उन्हें भूमि पर रखेंगे, वे वहीं स्थापित हो जाएंगे। ब्रजमंडल के ऊपर से उड़ते समय गिरिराज ने अपना भार इतना बढ़ा लिया कि मुनि को उन्हें वहीं रखना पड़ा। क्रोधित होकर पुलस्त्य मुनि ने शाप दिया कि गिरिराज प्रतिदिन तिल-तिल कर घटते जाएंगे। तदुपरांत, त्रेता युग में रामेश्वरम् सेतु निर्माण के समय भी हनुमान जी गिरिराज को ले जाने हेतु आए थे, परंतु सेतु निर्माण पूर्ण हो जाने के कारण वे ब्रज में ही रह गए। तब भगवान श्रीराम ने उन्हें वरदान दिया कि द्वापर युग के अंत में वे स्वयं अवतरित होकर उनके ऊपर लीलाएं करेंगे और उनकी पूजा का विधान स्थापित करेंगे。
श्रीमद्भागवत (10.24) में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि श्रीकृष्ण ने कर्म-मीमांसा का आश्रय लेते हुए नन्द महाराज से कहा—"स्वभाव-स्थः स्व-कर्म-कृत्... तद् एवास्य हि दैवतम्" (जीव अपने स्वभाव और कर्म के अधीन है, अतः जो हमारे जीवन का आधार है, वही हमारा पूज्य देवता है)। इस तार्किक दृष्टिकोण के आधार पर श्रीकृष्ण ने इन्द्र की पूजा को रोककर गायों, ब्राह्मणों और गोवर्धन पर्वत की पूजा का विधान स्थापित किया。
व्रत-पूर्व तैयारी, तिथि निर्णय एवं पात्रता
किसी भी शास्त्रीय अनुष्ठान की सफलता उसके सटीक काल-निर्णय और कर्ता की शारीरिक एवं मानसिक शुद्धता पर निर्भर करती है। 'निर्णयसिन्धु' और 'व्रतराज' जैसे प्रामाणिक धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में गोवर्धन पूजा के काल-निर्णय का अत्यंत गहन विवेचन किया गया है。
तिथि एवं काल निर्णय
'निर्णयसिन्धु' में तिथियों को 'शुद्धा' (पूर्ण) और 'विद्धा' (खंडित या मिश्रित) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। गोवर्धन पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (दीपावली के अगले दिन) को संपन्न की जाती है। शास्त्रीय श्रुति-विधान के अनुसार, देव-पूजन प्रातःकाल (पूर्वाह्न) में संपन्न होना चाहिए, जबकि मध्याह्न मनुष्यों के लिए और अपराह्न पितरों के लिए निर्दिष्ट है। अतः जिस दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा सूर्योदय के समय उपस्थित हो (उदया तिथि), वही दिन गोवर्धन पूजा के लिए सर्वथा ग्राह्य है। यद्यपि, 'व्रतराज' के अनुसार यदि कोई व्रत या अनुष्ठान विशेष रूप से सायंकाल या रात्रिकाल के लिए विहित है, तो उसे उसी तिथि में किया जाना चाहिए, भले ही वह 'विद्धा' क्यों न हो। इसी कारण कई परंपराओं में, विशेषकर पुष्टिमार्ग में, अपराह्न या गोधूलि बेला में भगवान का विशेष शृंगार और अन्नकूट दर्शन अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है。
पात्रता एवं मानसिक संकल्प
इस महान अनुष्ठान में जाति, वर्ण, लिंग या संप्रदाय का कोई भेद नहीं है। 'गर्ग संहिता' के अनुसार गोवर्धन साक्षात् श्रीकृष्ण के स्वरूप हैं और 'हरिदास वर्य' (हरि के सर्वश्रेष्ठ दास) कहलाते हैं, अतः जो भी जीव निष्काम या सकाम भाव से हरि-शरण में है, वह इस पूजन का पूर्ण अधिकारी है। व्रत-पूर्व साधक को ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक आहार और मानसिक शुद्धता (राग, द्वेष, लोभ से मुक्ति) सुनिश्चित करनी चाहिए。
प्रातःकाल उठकर साधक को नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, तीर्थ जल अथवा गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए। स्नान के पश्चात् निर्मल एवं शुद्ध वस्त्र (प्राथमिकता से पीत, लाल या नारंगी रंग के परिधान) धारण करने का विधान है。
गोवर्धन पर्वत का प्रतीकात्मक निर्माण विधि गोबर एवं अन्न से
शास्त्रों और लोक-परंपराओं में गिरिराज गोवर्धन के प्रतीकात्मक निर्माण की अत्यंत सूक्ष्म और तार्किक विधि वर्णित है। इसके लिए मुख्य रूप से गौ-मय (गाय के शुद्ध गोबर) का प्रयोग किया जाता है, जो सनातन संस्कृति में पवित्रता, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और गौ-माता के प्रति कृतज्ञता का सर्वोच्च प्रतीक है। कुछ विशिष्ट वैष्णव मंदिरों में केवल अन्न या पके हुए चावलों से भी गोवर्धन का निर्माण किया जाता है。
निर्माण प्रक्रिया एवं संरचनात्मक विवरण
- स्थान का चयन एवं शुद्धि: घर के आंगन, देव-स्थान, मंदिर प्रांगण या गोशाला को भली-भांति स्वच्छ कर, वहां गोबर और मिट्टी से लेपन किया जाता है ताकि भूमि पवित्र हो सके।
- पर्वत का आकार एवं स्वरूप: शुद्ध एवं ताजे गाय के गोबर से एक विशाल मानवाकार अथवा पर्वत के आकार की संरचना बनाई जाती है । यदि गोबर अधिक शुष्क हो, तो उसमें थोड़ा जल या शुद्ध मिट्टी मिलाकर उसे चिकना किया जाता है, जिससे आकृति स्पष्ट और स्थायी बने। इस संरचना में गिरिराज जी का मुख, वक्षस्थल और हस्त-पाद अत्यंत कलात्मक रूप से उकेरे जाते हैं। भगवान के एक हाथ में डंडा (लाठी) रखा जाता है जो गौ-चारण का प्रतीक है।
- सज्जा एवं परिकर: गोवर्धन पर्वत केवल एक शिला नहीं है, अपितु वह एक सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का प्रतिनिधित्व करता है। अतः गोवर्धन की मूल आकृति के चारों ओर ग्वाल-बाल, गौ-माता, बछड़े, वनस्पति (पेड़-पौधे, लताएं) और गोपियों की छोटी-छोटी आकृतियाँ गोबर या मिट्टी से निर्मित की जाती हैं। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है।
- नाभि-कुण्ड (मानसी गंगा का स्वरूप): गोवर्धन महाराज की नाभि के स्थान पर एक मिट्टी का पात्र (कुल्हड़) या गहरा गर्त बनाया जाता है। इस नाभि-कुण्ड में गंगाजल, दुग्ध, दधि, मधु और बताशे (शर्करा) डाले जाते हैं। पूजन के उपरांत इस नाभि के अमृत-तुल्य जल को पंचामृत के रूप में सभी भक्तों में वितरित किया जाता है।
- शिखर एवं नेत्र निर्माण: पर्वत के शिखरों को खील, बताशे, और रंग-बिरंगे पुष्पों से सजाया जाता है। कौड़ियों (Cowries) या श्वेत पुष्पों का प्रयोग कर भगवान के नेत्र और मुखाकृति का निर्माण किया जाता है। मुकुट को भी खील और पुष्पों से अलंकृत किया जाता है।
संकल्प, आवाहन एवं स्नान-विधान
निर्माण पूर्ण होने के पश्चात्, शुभ मुहूर्त में गृहस्थ या पुरोहित द्वारा शास्त्रसम्मत विधि से पूजन का आरंभ किया जाता है। यह पूजन सामान्य कर्मकांड से परे, पूर्ण भाव-समर्पण की मांग करता है。
संकल्प विधि
'व्रतराज' और 'धर्मसिन्धु' के अनुष्ठानिक क्रम के अनुसार, किसी भी वैदिक या पौराणिक पूजन का प्रथम चरण 'संकल्प' होता है। साधक को पूर्वाभिमुख होकर अपने दाहिने हाथ में जल, अक्षत (चावल), कुशा, पुष्प और द्रव्य (स्वर्ण या रजत मुद्रा) लेकर संकल्प करना चाहिए。
शास्त्रोक्त संकल्प:
अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयम्, तन्मे राध्यताम्, इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि।
(अर्थ: हे व्रतपति! मैं इस व्रत एवं अनुष्ठान का पूर्ण निष्ठा से आचरण करूंगा, मुझे इसकी शक्ति दें, मेरा व्रत निर्विघ्न सफल हो, और मैं असत्य से सत्य की ओर अग्रसर होऊं।)
इस वैदिक मंत्र के पश्चात, साधक विशिष्ट देश, काल, गोत्र और अपने नाम का उच्चारण (जैसे - अमुक गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुक शर्मा/वर्मा...) करते हुए गिरिराज गोवर्धन के पूजन और अन्नकूट अर्पण का संकल्प भूमि पर जल छोड़कर पूर्ण करता है。
आवाहन एवं प्राण-प्रतिष्ठा
श्रीमद्भागवत एवं अन्य पुराणों के अनुसार, गोवर्धन कोई सामान्य पाषाण या मिट्टी का ढेर नहीं, अपितु स्वयं 'हरिदास वर्य' और साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण के अभिन्न स्वरूप हैं । 'गर्ग संहिता' के अनुसार, साक्षात् पूर्णब्रह्म ही गोवर्धन के रूप में अवस्थित हैं (त्वं साक्षात् कृष्णचन्द्रस्य परिपूर्णतमस्य च) । गोवर्धन पर्वत की गोबर-निर्मित आकृति में साक्षात् भगवान का आवाहन निम्न मंत्रों से किया जाता है:
ओं नमो भगवते वासुदेवाय। गोवर्धनाय नमः। पातालं गच्छ गोवर्धन पर्वतं, तत्र कृता धर्मार्जितानि पुण्यानि। तथा, नमस्ते गिरिराजाय श्री गोवर्धन नामिने। अशेष क्लेश नाशाय परमानंद दायिने।।
(अर्थ: मैं उन गिरिराज को बारंबार प्रणाम करता हूँ जिनका नाम गोवर्धन है। वे असीमित क्लेशों और दुखों का शमन करने वाले तथा जीवों को परम आनंद प्रदान करने वाले हैं।)
स्नान-विधान
'गर्ग संहिता' के गिरिराज खण्ड में वर्णित है कि जब श्रीकृष्ण ने इन्द्र के गर्व को चूर कर दिया, तब देवराज इन्द्र और स्वर्ग की कामधेनु (सुरभि) ने पृथ्वी पर आकर भगवान श्रीकृष्ण (गोवर्धन) का दुग्ध और आकाश-गंगा के जल से अभिषेक किया था । सुरभि के दुग्ध से 'गोविन्द कुण्ड' का निर्माण हुआ और ऐरावत हाथी द्वारा लाए गए गंगाजल से 'मानसी गंगा' प्रकट हुई ।
इसी महान परम्परा का निर्वहन करते हुए, गोबर से निर्मित गोवर्धन पर या घर में स्थापित गोवर्धन शिला पर वैदिक मंत्रों के साथ दुग्ध, दधि, घृत, मधु, और शर्करा (पंचामृत) से अभिषेक किया जाता है । पुष्टिमार्ग की विशिष्ट परंपरा में, स्नान के लिए चार पात्र (लोटा) मानसी गंगा का जल, चार पात्र दुग्ध, और चार पात्र दधि का प्रयोग किया जाता है, जिसके पश्चात् पुनः दो पात्र दुग्ध और एक पात्र मानसी गंगा जल से अंतिम मार्जन किया जाता है ।
चरणबद्ध षोडशोपचार पूजन-विधि
आवाहन और अभिषेक के पश्चात षोडशोपचार (16 उपचारों से) पूजन किया जाता है। प्रत्येक उपचार का अपना आध्यात्मिक और तात्विक महत्व है。
| उपचार क्रम | विवरण एवं शास्त्रसम्मत भाव |
|---|---|
| 1. पाद्य, अर्घ्य, आचमन | भगवान के श्रीचरणों में जल (पाद्य), हाथों में अर्घ्य और मुख शुद्धि हेतु आचमन के लिए पवित्र जल अर्पित किया जाता है। |
| 2. स्नान | पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान (जैसा कि ऊपर वर्णित है)। |
| 3. वस्त्र एवं उपवस्त्र | पीताम्बर (पीले वस्त्र) अर्पित किए जाते हैं। पुष्टिमार्ग में भगवान को लाल रंग का दरियाई पीताम्बर और स्वर्ण ज़री के वस्त्र धारण कराए जाते हैं । |
| 4. यज्ञोपवीत एवं आभूषण | यज्ञोपवीत के साथ-साथ मुकुट, कौस्तुभ मणि का भाव करते हुए स्वर्ण-रजत या ताज़े पुष्पों के आभूषण अर्पित होते हैं। |
| 5. गंध एवं तिलक | अष्टगंध, चन्दन, कंकु (कुंकुम), और हल्दी से भगवान के भाल पर तिलक लगाया जाता है । |
| 6. अक्षत | 'ॐ श्री गोवर्धनाय नमः' का उच्चारण करते हुए अखंडित चावल (अक्षत) अर्पित किए जाते हैं । |
| 7. पुष्प एवं तुलसी दल | विष्णु-स्वरूप होने के कारण तुलसी दल का अर्पण अनिवार्य है। ॐ क्लीं कृष्णाय नमः का जप करते हुए सुगंधित पुष्प और तुलसी पत्र अर्पित किए जाते हैं । |
| 8. धूप | दशांग धूप प्रज्वलित कर भगवान को सुगन्धित वातावरण प्रदान किया जाता है । |
| 9. दीप | अज्ञान के अंधकार को दूर करने के प्रतीक स्वरूप गौ-घृत का दीपक प्रज्वलित कर दिखाया जाता है । |
| 10. नैवेद्य (अन्नकूट) | छप्पन भोग और अन्नकूट का महा-नैवेद्य अर्पित किया जाता है (विस्तृत विवरण अगले खंड में)। |
| 11. ताम्बूल | भोजन के पश्चात् मुख-वास हेतु लौंग, इलायची और कर्पूर युक्त पान का बीड़ा अर्पित किया जाता है । |
| 12. नीराजन (आरती) | भगवान की कर्पूर आरती और 'श्री गोवर्धन महाराज की आरती' का गायन किया जाता है । |
| 13. पुष्पांजलि | दोनों हाथों में पुष्प लेकर मंत्रोच्चार के साथ भगवान के चरणों में अर्पित किए जाते हैं । |
| 14. प्रदक्षिणा | सात बार गोवर्धन की परिक्रमा की जाती है (विस्तृत विवरण परिक्रमा खंड में)। |
| 15. क्षमा प्रार्थना | अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए भगवान से क्षमा याचना की जाती है। |
| 16. दक्षिणा | कर्म की पूर्णता हेतु अपनी सामर्थ्यानुसार द्रव्य (दक्षिणा) अर्पित किया जाता है। |
पुष्टिमार्गीय विशिष्टता
पुष्टिमार्ग के सेवा क्रम में शंख में चन्दन, कुंकुम और हल्दी भरकर शुद्धि की जाती है, और गोवर्धन जी के दोनों ओर पांच-पांच 'थापे' (हाथों के छापे) लगाए जाते हैं जो ग्वाल-बालों और गोपियों के भाव का प्रतीक हैं ।
अन्नकूट प्रसाद: छप्पन भोग की तैयारी, वर्गीकरण एवं अर्पण-प्रक्रिया
'अन्नकूट' का शाब्दिक अर्थ है "अन्न का पर्वत" (Mountain of food)। श्रीमद्भागवत (10.24.26) में शुकदेव गोस्वामी स्पष्ट उल्लेख करते हैं:
पच्यन्तां विविधाः पाकाः सूपान्ताः पायसादयः। संयावापूपशष्कुल्यः सर्वदोहश्च गृह्यताम्॥
(विविध प्रकार के पके हुए अन्न, सूप (दालें), खीर, पुए, पूरियाँ और दूध से बने सभी पदार्थ ग्रहण किए जाएं और गोवर्धन को अर्पित किए जाएं।)
छप्पन भोग का तार्किक आधार
हिंदू धर्म में '56 भोग' (Chhappan Bhog) का विशिष्ट गणितीय और आध्यात्मिक महत्व है। आख्यानों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण दिन में 8 प्रहर भोजन करते थे (अष्टयाम सेवा)। जब उन्होंने ब्रजवासियों की रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका उंगली पर लगातार 7 दिनों तक धारण किया, तो वे भोजन नहीं कर सके। जब सातवें दिन उन्होंने पर्वत नीचे रखा, तो कृतज्ञ ब्रजवासियों ने सात दिनों के छूटे हुए भोजन (8 प्रहर × 7 दिन = 56) को एक साथ 'छप्पन भोग' के रूप में बनाकर भगवान को अर्पित किया。
प्रसाद का शास्त्रीय वर्गीकरण
शास्त्रों में अन्नकूट प्रसाद का सात्विक होना अनिवार्य है। प्रसाद को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
- भक्ष्य: चबाकर खाने योग्य पदार्थ (जैसे - रोटी, पूरी, कचौरी, पराठा)।
- भोज्य: बिना चबाए निगलने योग्य (जैसे - कढ़ी, चावल, खिचड़ी, अन्नकूट की मिश्रित सब्जी) ।
- लेह्य: चाटने योग्य पदार्थ (जैसे - चटनी, रबड़ी, शहद)।
- पेय: पीने योग्य तरल पदार्थ (जैसे - छाछ, दुग्ध, पना) ।
इनमें सर्वाधिक महत्व 'कढ़ी', 'चावल', 'मिश्रित शाक' (सभी उपलब्ध मौसमी सब्जियों को मिलाकर बनाई गई अन्नकूट की सब्जी) और 'बाजरे' का होता है ।
पुष्टिमार्गीय विशिष्ट परंपरा एवं अपवाद
पुष्टिमार्गीय वाङ्मय के अनुसार, अन्नकूट में प्रयुक्त सामग्री अत्यंत शुद्धता से निर्मित होनी चाहिए। सामान्यतः पुष्टिमार्ग में चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल दशमी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) के दौरान बैंगन (Brinjal), गाजर, मूली, लहसुन, प्याज आदि पूर्णतः वर्जित होते हैं। परंतु गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) का दिन इसका एकमात्र अपवाद है। इस विशिष्ट दिन भगवान को बैंगन की सब्जी और कांजी (गन्ने के रस से बना किण्वित पेय) का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है, जो इस उत्सव की विशालता और सर्व-समावेशिता को दर्शाता है。
शास्त्रसम्मत अर्पण विधि
जब अन्नकूट का भोग तैयार हो जाता है, तब उसे एक विशाल पर्वत के आकार में भगवान के समक्ष सजाया जाता है। भोग अर्पण की प्रक्रिया:
- सर्वप्रथम संपूर्ण नैवेद्य पर तुलसी दल (तुलसी पत्र) रखा जाता है, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण भोग स्वीकार नहीं करते ।
- साधक को आंखों पर पट्टी बांधकर या मंदिर में पर्दा कर भगवान को एकांत प्रदान करना चाहिए, जिससे वे शांतिपूर्वक नैवेद्य ग्रहण कर सकें।
- पंच-प्राणों को आहुति देने वाले प्राणाहुति मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जिससे अन्न में प्राण का संचार होता है और वह भगवान के पांचों प्राणों को तृप्त करता है । प्राणाहुति मंत्र: ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐ व्यानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा। ॐ समानाय स्वाहा।
- भोग अर्पित करने के उपरांत 'जल' और 'ताम्बूल' (पान का बीड़ा) अर्पित किया जाता है ।
- अंत में पूर्ण समर्पण के भाव से 'श्री कृष्णार्पणमस्तु' (यह सब श्रीकृष्ण को समर्पित है) कहा जाता है ।
श्रीमद्भागवत के अनुसार, श्रीकृष्ण ने स्वयं एक द्वितीय एवं विशाल स्वरूप धारण कर (शैलोऽस्मीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद् बृहद्वपुः) उस सम्पूर्ण अन्नकूट को अपने सहस्रों हाथों से ग्रहण किया था । अतः यह अटूट विश्वास है कि अर्पित किया गया कण-कण साक्षात् भगवान द्वारा स्पृष्ट होकर दिव्य प्रसाद रूप में परिवर्तित हो जाता है, जिसे बाद में सभी भक्तों में वितरित किया जाता है。
पुष्टिमार्गीय सेवा क्रम एवं अनुष्ठानिक विशिष्टता
श्री वल्लभ सम्प्रदाय (पुष्टिमार्ग) में गोवर्धन पूजा को 'मर्यादा मार्ग' से ऊपर उठकर 'पुष्टि' (कृपा) के मार्ग का सर्वोच्च उत्सव माना जाता है । नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर सहित सभी पुष्टिमार्गीय हवेलियों में इसका एक निश्चित 'सेवा क्रम' (Seva Kram) है ।
- राजभोग आरती के पश्चात् तिलकायत महाराज द्वारा एक ओखली (mortar) में सेव, घी, और बूरा डालकर 'मुहूर्त' किया जाता है ।
- श्री कल्याणरायजी महाराज और अन्य गोसाईं बालक श्री ठाकुरजी को एक सुखपाल (palanquin) में विराजित कर कीर्तन के साथ मंदिर में लाते हैं ।
- श्री विट्ठलनाथजी को श्रीजी के सम्मुख विराजित किया जाता है, जबकि श्री नवनीत लाल जी को गोवर्धन पूजा के लिए ले जाया जाता है। 'लालन' को सूरजपोल की सीढ़ियों (पगठिया) पर विराजित किया जाता है ।
- गोवर्धन पूजा के पश्चात् लाला को 'दूध की चपटिया' और 'बीड़ी' का विशेष भोग लगाया जाता है ।
- इस अवसर पर विशिष्ट 'धोल-पद' (Dholpads) और 'कीर्तन' गाए जाते हैं, जो श्री हरिरायजी और अन्य अष्टछाप कवियों द्वारा रचित हैं ।
गिरिराज परिक्रमा-विधि एवं नियम
गोवर्धन पूजा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य अंग गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा (Circumambulation) है। श्रीमद्भागवत (10.24) में उल्लेख है कि भगवान के आदेश पर ब्रजवासियों ने गायों, ब्राह्मणों और गिरिराज को दाहिने रखते हुए उनकी परिक्रमा की थी (गो-धनानि पुरस्-कृत्य गिरिं चक्रुः प्रदक्षिणम्) ।
परिक्रमा के प्रकार
- बड़ी परिक्रमा: यह लगभग 12 किलोमीटर (सात कोस) की होती है।
- छोटी परिक्रमा: यह लगभग 10 किलोमीटर (तीन कोस) की होती है, जो मानसी गंगा पर समाप्त होती है।
- दंडवती परिक्रमा: यह सबसे कठिन और तपस्या-स्वरूप परिक्रमा है, जिसे साष्टांग दंडवत (लेटकर) करते हुए पूरा किया जाता है। इस 21 किलोमीटर लंबी परिक्रमा को पूरा करने में साधक को प्रायः सात दिन लग जाते हैं ।
- परिक्रमा का मार्ग: यह पवित्र परिक्रमा मानसी गंगा कुण्ड से आरंभ होकर श्री हरदेव जी के दर्शन करते हुए राधा कुण्ड, श्याम कुण्ड, दान घाटी, मुखारविंद, ऋणमोचन कुण्ड, कुसुम सरोवर और पूंछरी (पूंछरी का लौठा) होते हुए पुनः मानसी गंगा पर संपन्न होती है ।
परिक्रमा के शास्त्रीय नियम
- दिशा एवं स्वरूप: शास्त्रों के अनुसार, जिसकी परिक्रमा की जा रही हो, वह सदैव दाहिनी ओर (Right-hand side) होना चाहिए। अतः गोवर्धन को सदैव दायीं ओर रखकर परिक्रमा की जाती है।
- पद-नियम: परिक्रमा पूर्णतः नंगे पैर (बिना जूते-चप्पल) की जानी चाहिए। यह भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर शारीरिक तप और भूमि-स्पर्श का प्रतीक है।
- मानसिक स्थिति एवं पवित्रता: परिक्रमा के मध्य सांसारिक वार्तालाप पूर्णतः वर्जित है। साधक का मन पूर्णतः शांत और एकाग्र होना चाहिए । संपूर्ण मार्ग में केवल हरि-नाम, स्तोत्र या गोवर्धन जप होना चाहिए । धूम्रपान, मद्यपान या किसी भी प्रकार का व्यसन करते हुए परिक्रमा करना घोर पाप (अपराध) माना गया है ।
- अखंडता: एक बार परिक्रमा आरंभ करने के पश्चात् उसे बीच में अधूरा छोड़ना वर्जित है। यदि किसी अपरिहार्य या विशेष कारणवश रुकना पड़े, तो भगवान से क्षमा-याचना कर ही स्थान छोड़ना चाहिए और अगले दिन वहीं से पुनः आरंभ करना चाहिए ।
परिक्रमा करते हुए साधक को निम्नलिखित महामंत्र का निरंतर जप करना चाहिए:
गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक। विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रभो भव।।
(अर्थ: हे गोकुल की रक्षा करने वाले, गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले! भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) की भुजाओं द्वारा उठाए गए हे पर्वतराज! आप कोटि-कोटि गायों के रक्षक व प्रभु बनें।)
गौ-माता पूजन एवं पर्यावरणीय दृष्टिकोण
गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं চরম है, अपितु यह प्रकृति, पर्यावरण और पशु-धन के संरक्षण का महानतम सनातन संदेश है। कृषि प्रधान भारतीय सभ्यता में गाय सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का आधार है। इसी कारण श्रीकृष्ण को 'गोपाल' (गायों का पालन करने वाला) और 'गोविन्द' (गायों और इंद्रियों का रक्षक) कहा गया है。
गौ-पूजन की शास्त्रोक्त विधि
दीपावली के अगले दिन (गोवर्धन पूजा के दिन) गायों (गौ-माता) की पूजा का विशिष्ट विधान है।
- प्रातःकाल गायों और बछड़ों को शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है।
- उनके सींगों पर सरसों का तेल और गेरू (हिंगुल/लाल रंग) लगाया जाता है।
- उनके गले में ताज़े पुष्पों की मालाएँ और नई घंटियां बांधी जाती हैं ।
- उनके भाल पर हल्दी, चन्दन और रोली का तिलक किया जाता है ।
- तत्पश्चात उन्हें अन्नकूट का प्रसाद, गुड़, और हरा चारा (Gokul-char) बड़े प्रेम से खिलाया जाता है ।
गौ-पूजन और उन्हें नैवेद्य अर्पण के समय निम्नलिखित शास्त्रोक्त मंत्र का उच्चारण किया जाता है:
लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता। घृतं वहति यज्ञार्थं मम पापं व्यपोहतु।।
(अर्थ: जो साक्षात् लक्ष्मी लोकपालों के यहाँ धेनु (गाय) के रूप में स्थित हैं, जो सभी यज्ञों की पूर्णता के लिए घृत (घी) वहन करती हैं, वे गौ-माता मेरे समस्त पापों का नाश करें।)
व्रत के नियम, निषेध एवं दान-विधान
'व्रतराज' और 'धर्मसिन्धु' में इस अनुष्ठान को संपन्न करने वाले साधकों के लिए कुछ कठोर नियम और दान-विधान सुनिश्चित किए गए हैं。
नियम एवं निषेध
- अहंकार का त्याग: यह पर्व देवराज इन्द्र के सत्ता-मद और अहंकार के पतन का ऐतिहासिक प्रतीक है । अतः साधक को कर्तापन और संपदा के अहंकार से पूर्णतः मुक्त होना चाहिए।
- पवित्रता: घर में पूर्णतः सात्विक वातावरण होना चाहिए। किसी भी प्रकार के तामसिक आहार (मांस, मदिरा) या द्यूत-क्रीड़ा का सर्वथा निषेध है ।
- गोबर का सम्मान (Environmental Ethics): गोवर्धन निर्माण में प्रयुक्त गोबर का तनिक भी अपमान नहीं होना चाहिए। पूजा के अगले दिन उस पवित्र गोबर को खाद के रूप में खेतों, पवित्र स्थानों या पौधों की जड़ों में डालना चाहिए, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़े । विकल्पतः, उसके उपले (कंडे) बनाकर शीत ऋतु में वातावरण को शुद्ध करने हेतु अलाव, हवन और धूनी के लिए प्रयोग करना चाहिए । उसे नालियों या अपवित्र स्थानों पर फेंकना घोर पाप है ।
दान-विधान
धर्मशास्त्रों के अनुसार, किसी भी व्रत, पारण या उत्सव की पूर्णता सुपात्र को दान दिए बिना संभव नहीं है。
- गोवर्धन पूजा के दिन निर्धनों, असहायों और योग्य ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र और स्वर्ण (अपनी सामर्थ्यानुसार) का दान करना चाहिए ।
- 'गर्ग संहिता' के अनुसार विद्या-दान और ज्ञान-दान को भी इस दिन अत्यंत श्रेष्ठ (ब्रह्मदान के तुल्य) माना गया है।
- गौ-शालाओं में गौ-ग्रास हेतु धन या चारे का गुप्त दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है ।
मुख्य स्तोत्र एवं उनका अर्थ-सहित प्रयोग
गर्ग संहिता, श्रीमद्भागवत और विभिन्न वैष्णव तंत्रों में गोवर्धन पूजा के लिए विशेष स्तोत्रों का विधान है, जिनका सस्वर उच्चारण अनुष्ठान की आध्यात्मिक पूर्णता के लिए अनिवार्य है。
श्री गर्ग संहिता गिरिराज खण्ड स्तुति
जब देवराज इन्द्र ने अपना अहङ्कार त्याग कर भगवान की शरण ली, तब उन्होंने इसी स्तोत्र से भगवान की स्तुति की थी ।
ॐ नमो गोवर्द्धनोद्धरणाय गोविन्दाय गोकुलनिवासाय गोपालाय गोपालपतये गोपीजनभर्त्रे गिरिजोद्धर्त्रे करुणानिधये जगद्बिधये जगन्मङ्गलाय जगन्निवासाय जगन्मोहनाय कोटिमन्मथमन्मथाय वृषभानुसुतावराय श्रीनन्दराजकुलप्रदीपाय श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय त्वसंख्यब्रह्माण्डपतये गोलोकधामधिषणाधिपतये स्वयं भगवते सबलाय नमस्ते नमस्ते नमस्ते।
तात्विक अर्थ: हे गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका पर उठाने वाले, हे गोविन्द, हे गोकुल में नित्य निवास करने वाले, हे गोपालों के स्वामी, हे गोपियों के भर्ता (रक्षक), गिरिराज का उद्धार करने वाले, हे करुणा के अगाध निधान, जगत के विधाता, जगत का मंगल करने वाले, जगत के निवास-स्थान, जगत को मोहित करने वाले, कोटि-कोटि कामदेवों के भी कामदेव (मन्मथ-मन्मथ), श्रीराधा (वृषभानु-सुता) के प्राणनाथ, नन्दराज के कुल के प्रदीप्त दीपक, परिपूर्णतम साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण, जो अनंत ब्रह्माण्डों के एकमात्र पति हैं और नित्य गोलोक धाम के अधिपति हैं, उन बलदेव-सहित भगवान को मेरा मन, कर्म और वचन से बारंबार नमस्कार है。
फल-श्रुति
पुराणों और 'गर्ग संहिता' में इस महान अनुष्ठान की अत्यंत विशद फल-श्रुति (महिमा) गाई गई है:
- पाप-नाश और संकट-मुक्ति: जो व्यक्ति कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में गिरिराज गोवर्धन और गौ-माता की भक्ति-भाव से पूजा करता है, उसके कोटि-कोटि जन्मों के संचित पाप भस्म हो जाते हैं। गर्ग संहिता के अनुसार उपर्युक्त इन्द्र-कृत स्तोत्र का प्रातःकाल उठकर पाठ करने से मनुष्य को सर्व-सिद्धियां प्राप्त होती हैं और जीवन के घोर संकटों का भय सर्वथा समाप्त हो जाता है (सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य संकटान्न भयं भवेत्)।
- प्रकृति और कृषि की समृद्धि: चूंकि यह पर्व मूलतः प्रकृति-पूजन (Nature Worship) है, अतः जो कृषक या गृहस्थ यह पूजन करता है, उसके घर में अन्न, जल और गो-धन की कभी कमी नहीं होती। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में भौतिक समृद्धि आती है और अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।
- भगवत्-प्रेम की प्राप्ति: पुष्टिमार्गीय और गौड़ीय भावना के अनुसार, गिरिराज साक्षात् श्रीकृष्ण के स्वरूप होने के साथ-साथ उनके परम भक्त ('हरिदास वर्य') भी हैं। उनकी उपासना और परिक्रमा से साधक के हृदय में साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अहैतुकी भक्ति और निष्काम प्रेम जागृत होता है । यह अनुष्ठान जीव को 'मैं' (अहंकार) से निकालकर 'तू' (समर्पण) की ओर ले जाता है।
निष्कर्ष
गोवर्धन पूजा (अन्नकूट महोत्सव) केवल एक पौराणिक आख्यान का अंध-अनुकरण मात्र नहीं है, अपितु यह सनातन दर्शन के उस गूढ़ और परिष्कृत रहस्य को उद्घाटित करता है जहाँ ईश्वर, जीव और प्रकृति एकरूप हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत, गर्ग संहिता और धर्मशास्त्रों (निर्णयसिन्धु, व्रतराज) का सूक्ष्म अध्ययन यह प्रमाणित करता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने सकाम इन्द्र-याग का निषेध कर गोवर्धन-पूजन के माध्यम से कर्मकाण्डीय भय को समाप्त कर विशुद्ध प्रेमाभक्ति और पर्यावरण-वंदना (Ecological reverence) के मार्ग को प्रशस्त किया。
विशाल अन्नकूट का अर्पण यह दर्शाता है कि जो कुछ भी प्रकृति हमें प्रदान करती है, वह सर्वप्रथम उसी परम सत्ता को प्रसाद रूप में समर्पित होना चाहिए जिसने इसे सृजित किया है। गोबर से निर्मित गोवर्धन, 56 भोगों का महा-नैवेद्य, मानसी गंगा का ध्यान, और परिक्रमा का कठोर विधान—यह सम्पूर्ण अनुष्ठानिक चक्र मनुष्य के मन से लौकिक अहङ्कार को क्षीण कर उसे परम सत्ता के प्रति पूर्ण शरणागति का व्यावहारिक पाठ पढ़ाता है। अतः जो साधक इस शोध-प्रबंध में वर्णित शास्त्रसम्मत विधि, निर्मल भावना और प्रामाणिक वैदिक-पौराणिक मंत्रों के साथ गिरिराज गोवर्धन की उपासना करता है, वह निस्संदेह इहलोक में समस्त ऐश्वर्यों को भोगकर अंततः परम धाम का अधिकारी बनता है。






