विस्तृत उत्तर
गोवर्धन पूजा दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाई जाती है। इस पर्व में 'अन्नकूट' का विशेष महत्व है — अन्नकूट का शाब्दिक अर्थ है 'अन्न का पर्वत।'
अन्नकूट की परंपरा उस दिन से चली जब भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल के लोगों को देवराज इंद्र की पूजा बंद करवाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा आरंभ कराई। इंद्र ने क्रोधित होकर सात दिन तक मूसलाधार वर्षा की। श्रीकृष्ण ने उस पूरे समय अपनी कनिष्ठा उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठाए रखा — सात दिन और आठ पहर भूखे-प्यासे। इंद्र का अभिमान चूर हुआ और ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि ये स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। इंद्र ने क्षमायाचना की।
इसके बाद ब्रजवासियों ने भगवान को सात दिन और आठ पहर के हिसाब से 8×7 = 56 व्यंजन खिलाए — यही 'छप्पन भोग' की परंपरा का मूल है। एक अन्य मान्यता यह भी है कि कृष्ण-राधा के आसन कमल की 56 पंखुड़ियाँ होती हैं, इसलिए 56 भोग लगाए जाते हैं।
अन्नकूट में कई प्रकार के अनाज, सब्जियाँ और पकवान मिलाकर भगवान को भोग लगाया जाता है — कढ़ी-चावल, पूड़ी, रोटी, मिश्रित सब्जी, मूँग की खिचड़ी, बाजरे का हलवा, मिठाइयाँ और दूध-मलाई। मंदिरों में यह 56 या 108 प्रकार के व्यंजनों का भोग होता है। घर के बाहर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसे इन पकवानों का भोग लगाया जाता है, फिर 7 बार परिक्रमा की जाती है।
अन्नकूट प्रकृति, गोवंश और भगवान की कृपा के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है। श्रीकृष्ण ने स्वयं इस पर्व को हर वर्ष मनाने की आज्ञा दी थी।



