योगिनी एकादशी की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा
पारंपरिक मंगलाचरण एवं कथा की पृष्ठभूमि
श्रीगणेशाय नमः। श्रीसरस्वत्यै नमः। श्रीगुरुभ्यो नमः। श्रीवेदव्यासाय नमः।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
सूत जी शौनकादि ऋषियों को संबोधित करते हुए कहते हैं— हे परम तपस्वी ऋषियों! परम पावन नैमिषारण्य की इस पवित्र भूमि पर मैं आप सभी को समस्त पापों का समूल नाश करने वाली, त्रैलोक्य में अत्यंत दुर्लभ और भगवान श्रीहरि को परम प्रिय 'योगिनी एकादशी' की वह पुण्यमयी कथा सुनाता हूँ, जो पुराणों में वर्णित है। यह वही पवित्र कथा है, जिसे द्वापर युग के अंत में स्वयं कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर के संशय निवारण हेतु कही थी ।
परंपरा के अनुसार, एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है, जब व्रती भगवान विष्णु के सम्मुख बैठकर पूर्ण श्रद्धा और अगाध भक्ति-भाव से इस शास्त्र-प्रमाणित कथा का आद्योपांत श्रवण करता है। हे भक्तजनो! अपने मन की वृत्तियों को एकाग्र कर, समस्त सांसारिक चिंताओं को त्याग कर, भगवान वासुदेव के श्रीचरणों में अपना ध्यान लगाते हुए इस पावन कथा का रसपान करें ।
प्रथम पाठ: ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार योगिनी एकादशी की मुख्य कथा
कथा का यह स्वरूप महर्षि वेदव्यास रचित 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के अंतर्गत वर्णित है, जिसमें धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण का अत्यंत गूढ़, विस्तृत और भक्तिपूर्ण संवाद निहित है । पारंपरिक रूप से कथा-वाचन के समय इसी संवाद से कथा का श्रीगणेश किया जाता है。
युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न
कुरुक्षेत्र के भीषण महायुद्ध के पश्चात्, जब धर्मराज युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर आसीन हुए, तब उनके मन में अपने स्वजनों के वध और संसार की नश्वरता को लेकर तीव्र वैराग्य और ग्लानि उत्पन्न हुई। अपने मन की शांति और लौकिक-पारलौकिक कल्याण की कामना से उन्होंने योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की शरण ली ।
एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर, अत्यंत विनयपूर्वक भगवान वासुदेव से पूछा— "हे त्रिलोकीनाथ! हे मधुसूदन! हे पापहारिन! आपने मुझ पर अतीव कृपा कर ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का अद्भुत माहात्म्य और व्रत विधान विस्तारपूर्वक सुनाया है । उस कथा के श्रवण से मेरे हृदय को असीम शांति प्राप्त हुई है। हे प्रभु! अब मेरी यह जानने की तीव्र उत्कंठा है कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम क्या है? उस एकादशी के पीठासीन देवता कौन हैं? उसकी कथा क्या है और उसके पालन से किस पुण्य फल की प्राप्ति होती है? हे जगन्नाथ! आप कृपा करके मेरे इस संशय का निवारण करें और इस पावन कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन कर मुझे कृतार्थ करें।" ।
श्रीकृष्ण द्वारा योगिनी एकादशी का माहात्म्य-वर्णन
धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसे धर्मयुक्त और विनयपूर्ण वचनों को सुनकर देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई। उन्होंने अत्यंत मधुर और गंभीर वाणी में उत्तर दिया— "हे कुरुश्रेष्ठ! हे राजन! तुमने संपूर्ण लोकों के कल्याण की कामना से अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। मैं तुम्हें उस परम श्रेष्ठ एकादशी का वृत्तांत सुनाता हूँ, जो आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आती है ।
हे धर्मराज! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की इस परम पवित्र एकादशी को 'योगिनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है । यह एकादशी तीनों लोकों में सार-स्वरूप है। यह बड़े से बड़े और भयंकर से भयंकर पापों का समूल नाश करने वाली है। हे नृपश्रेष्ठ! यह योगिनी एकादशी संसार रूपी अगाध और भयंकर भवसागर में डूबते हुए प्राणियों के लिए एक सुदृढ़ और सुरक्षित नौका के समान है, जो उन्हें इस मृत्युलोक के कष्टों से निकालकर सीधे पारलौकिक वैकुंठ धाम के तट पर पहुँचा देती है । इसके माहात्म्य के श्रवण मात्र से मनुष्य के समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक संताप मिट जाते हैं। हे राजन! इस विषय में पुराणों में एक अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक इतिहास वर्णित है, जिसे मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, तुम इसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।" ।
अलकापुरी नगरी का वर्णन एवं राजा कुबेर का परिचय
भगवान श्रीकृष्ण कथा का आरंभ करते हुए कहते हैं— "हे युधिष्ठिर! स्वर्ग लोक के समीप, हिमालय के अत्यंत रमणीक शिखरों के मध्य 'अलकापुरी' नाम की एक अत्यंत भव्य और दिव्य नगरी है । इस नगरी का ऐश्वर्य अवर्णनीय है। यहाँ के भवन शुद्ध सुवर्ण और बहुमूल्य मणियों से जड़े हुए हैं और यहाँ की छटा देवलोक को भी मात देने वाली है। इस अलकापुरी नगरी के अधिपति धनराज कुबेर हैं, जो यक्षों के राजा और देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं ।
राजाधिराज कुबेर परम शिवभक्त हैं। उनके हृदय में देवाधिदेव महादेव के प्रति अनन्य और प्रगाढ़ भक्ति है। वे बिना किसी विघ्न के, प्रतिदिन पूर्ण नियम, निष्ठा और पवित्रता के साथ भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा किया करते थे । भगवान आशुतोष की अनवरत आराधना ही उनके जीवन का परम लक्ष्य और उनकी अपार संपदा का मूल कारण थी। उनका संपूर्ण जीवन शिव के चरणों में समर्पित था।"
हेममाली नामक यक्ष का प्रसंग एवं पुष्प लाने का दायित्व
"हे राजन! राजा कुबेर की सेवा में अनेकों यक्ष, गंधर्व और किन्नर नियुक्त थे। उन्हीं असंख्य सेवकों में 'हेममाली' नाम का एक यक्ष भी था । हेममाली कुबेर का अत्यंत प्रिय और विश्वासपात्र सेवक था। राजा कुबेर ने उसे एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण दायित्व सौंप रखा था। हेममाली का प्रतिदिन का यह नित्य कर्म था कि वह सूर्योदय होते ही पावन मानसरोवर झील पर जाए और वहाँ से भगवान शिव की पूजा के लिए ताजे, सुगंधित और खिले हुए कमल के पुष्प चुनकर लाए । उन पवित्र पुष्पों से ही राजा कुबेर देवाधिदेव महादेव का मध्याह्न पूजन संपन्न किया करते थे。
उस हेममाली यक्ष की एक अत्यंत रूपवती और लावण्यमयी पत्नी थी, जिसका नाम 'स्वरूपवती' था । स्वरूपवती के नेत्र अत्यंत विशाल और आकर्षक थे और उसका मुखमंडल पूर्ण चंद्रमा के समान कांतिमान था। हेममाली अपनी उस सुंदरी पत्नी के प्रेम और रूप-लावण्य में अत्यंत आसक्त रहता था। उसका मन सदैव अपनी पत्नी के इर्द-गिर्द ही भ्रमण करता रहता था। वह अपनी पत्नी के यौवन और सौंदर्य का इस प्रकार दास बन चुका था कि उसके लिए अन्य सभी सांसारिक और देव-कार्य गौण हो चुके थे।"
पुष्प लाने में विलंब और पत्नी में आसक्ति
"एक दिन की बात है, हे युधिष्ठिर! यक्ष हेममाली अपनी नित्य दिनचर्या के अनुसार प्रातःकाल मानसरोवर झील गया। वहाँ से उसने भगवान शिव की पूजा के लिए अत्यंत सुंदर और सुगन्धित कमल के पुष्प तोड़े । उन पवित्र पुष्पों को लेकर उसे सीधे राजा कुबेर के राजभवन में जाना चाहिए था, ताकि शिव-पूजन समय पर संपन्न हो सके。
किंतु अपनी पत्नी स्वरूपवती के प्रेम में अंधा और कामासक्त होने के कारण, वह राजभवन जाने के स्थान पर अपने ही घर की ओर चला गया । घर पहुँचकर जब उसने अपनी रूपसी पत्नी को देखा, तो वह अपने स्वामी के प्रति अपने कर्तव्य और भगवान शिव की पूजा के पावन समय को पूर्णतः विस्मृत कर बैठा। वह देव-पूजन के लिए लाए गए पुष्पों का टोकरा एक ओर रखकर अपनी पत्नी के साथ हास-विलास और काम-क्रीड़ा में मग्न हो गया । उसे इस बात का तनिक भी भान न रहा कि राजा कुबेर शिव-पूजन के लिए उसकी और उन पुष्पों की कितनी व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"
कुबेर का भयंकर क्रोध और कठोर शाप
"इधर अलकापुरी के राजप्रासाद में, राजा कुबेर स्नान-ध्यान कर, शुद्ध वस्त्र धारण किए, भगवान शिव के मंदिर में पूजन की समस्त सामग्री एकत्रित करके बैठे थे । वे केवल उन ताजे पुष्पों की प्रतीक्षा कर रहे थे जो हेममाली को लाने थे। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने लगा। प्रातःकाल से मध्याह्न हो गया। शिव-पूजन का शुभ मुहूर्त बीतने लगा, किंतु न तो हेममाली आया और न ही पूजा के पुष्प आए ।
कुबेर के मन में शंका उत्पन्न हुई। जब मध्याह्न काल भी व्यतीत होने लगा और हेममाली नहीं लौटा, तो शिव-पूजन में हुए इस भयंकर विघ्न और विलंब के कारण राजा कुबेर का क्रोध भड़क उठा । उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने तुरंत अपने अन्य यक्ष सेवकों को बुलाया और अत्यंत क्रुद्ध स्वर में आदेश दिया— 'हे सेवको! वह दुरात्मा हेममाली अभी तक पुष्प लेकर क्यों नहीं आया? तुम लोग शीघ्र जाओ और पता लगाओ कि वह किस कारण से अब तक अनुपस्थित है और उसने शिव-पूजन में यह महा-अपराध क्यों किया है?' ।
राजा की आज्ञा पाकर यक्ष सेवक तत्काल चारों दिशाओं में दौड़ पड़े। कुछ ही समय पश्चात उन्होंने संपूर्ण स्थिति का पता लगा लिया और राजभवन लौटकर राजा कुबेर के समक्ष उपस्थित हुए। सेवकों ने हाथ जोड़कर कांपते हुए कहा— 'हे यक्षराज! हे स्वामिन! आपका सेवक हेममाली कोई मार्ग नहीं भटका है और न ही उस पर कोई विपत्ति आई है। वह तो अत्यंत स्वेच्छाचारी हो गया है। मानसरोवर से पुष्प लाने के पश्चात वह अपने घर चला गया और इस समय वह अपनी पत्नी के साथ काम-क्रीड़ा और हास-विलास में रमण कर रहा है।' ।
सेवकों के मुख से यह वृत्तांत सुनकर कुबेर के क्रोध की कोई सीमा न रही। उनका शरीर क्रोध की अग्नि में जलने लगा। उन्होंने सिंह गर्जना करते हुए आदेश दिया— 'उस पापी और दुराचारी को तत्काल मेरे समक्ष उपस्थित करो!' ।
राजा के क्रुद्ध सेवकों ने हेममाली को उसके घर से पकड़ा और उसे उसी अवस्था में कुबेर के दरबार में ले आए। भय और अपराध-बोध से कांपता हुआ हेममाली राजसभा में उपस्थित हुआ। उसने आते ही राजा कुबेर को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। उसकी आँखें लज्जा से झुकी हुई थीं ।
उसे देखते ही राजा कुबेर के होंठ फड़कने लगे और उन्होंने गर्जना करते हुए उससे कहा— 'ओ पापी! ओ दुष्ट! ओ दुराचारी और कामुक व्यक्ति! तूने अपनी काम-वासना की पूर्ति के लिए मेरे पूज्य और आराध्य देवाधिदेव भगवान शिव की पूजा में विघ्न डाला है । तूने देव-कार्य की घोर अवहेलना की है। तेरा यह अपराध क्षमा के योग्य नहीं है। इसलिए हे नीच! मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू इसी क्षण इस दिव्य अलकापुरी नगरी और यक्ष योनि से भ्रष्ट हो जाए। तू उस प्रियतमा पत्नी से सदा के लिए वियुक्त (अलग) हो जाए, जिसके प्रेम में अंधा होकर तूने यह महापाप किया है। तू मृत्युलोक (पृथ्वी) पर गिर जाए और तेरे शरीर में भयंकर श्वेत कुष्ठ रोग (सफेद कोढ़) उत्पन्न हो जाए । जा, पृथ्वी पर जाकर अपने इस भयंकर कर्म का फल भोग!'"
कुष्ठ-रोग से पीड़ित होना और वन में कष्ट
"राजा कुबेर के मुख से शाप के कठोर वचन निकलते ही हेममाली स्वर्ग-समान अलकापुरी नगरी से सीधे नीचे मृत्युलोक में आ गिरा । पृथ्वी पर गिरते ही उसका सुंदर और दिव्य यक्ष शरीर भयंकर श्वेत कुष्ठ रोग से आक्रांत हो गया। उसके शरीर से रक्त और पीब बहने लगा। उसके अंग गलने लगे और शरीर में असहनीय पीड़ा तथा जलन होने लगी। वह अपनी प्राणप्रिय पत्नी से बिछड़ गया ।
हे युधिष्ठिर! पृथ्वी पर आकर वह घने, कंटीले और भयंकर वनों में दर-दर भटकने लगा। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की प्रचंड धूप और शीत ऋतु में हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड उसे सताने लगी । उसे न तो खाने को अन्न मिलता था और न ही पीने को स्वच्छ जल। वह भूख-प्यास और कोढ़ की महापीड़ा से दिन-रात विलाप करता रहता था। उसे दिन में एक क्षण के लिए भी चैन नहीं मिलता था और रात्रि में वह तनिक भी सो नहीं पाता था ।
किंतु हे राजन! एक अत्यंत आश्चर्यजनक और शुभ बात यह थी कि इतने भयंकर कष्ट और पतन के बाद भी, हेममाली की स्मरण-शक्ति नष्ट नहीं हुई थी। चूंकि उसने अपने पूर्व जीवन में प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा के लिए पवित्र कमल के पुष्प एकत्रित किए थे, उस आंशिक शिव-सेवा के पुण्योदय के प्रभाव से उसे 'जातिस्मर' (अपने पूर्व जन्म और कर्मों की पूर्ण स्मृति) प्राप्त थी । उसे यह भली-भांति ज्ञात था कि उसका यह पतन और यह भयंकर रोग किस महापाप के कारण हुआ है। वह अपने किए पर निरंतर पश्चाताप करता रहता था।"
ऋषि मार्कण्डेय से भेंट
"इस प्रकार अपने पाप का प्रायश्चित करते और असहनीय पीड़ा को सहते हुए हेममाली कई वर्षों तक जंगलों और पर्वतों पर भटकता रहा । भटकते-भटकते एक दिन उसके पुण्यों का उदय हुआ और वह हिमालय की सुरम्य उपत्यकाओं में स्थित महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम में जा पहुँचा ।
महर्षि मार्कण्डेय अत्यंत सिद्ध और तपस्वी संत थे। उनकी आयु ब्रह्मा जी के सात कल्पों के समान बताई गई है । उनका आश्रम अत्यंत शांत और तपोबल से परिपूर्ण था। महर्षि का तेज द्वितीय ब्रह्मा के समान दमक रहा था। हेममाली उनके आश्रम में पहुँचा और उसने दूर से ही उन महान ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया। कुष्ठ रोग से पीड़ित और अत्यंत मलिन अवस्था में कांपते हुए हेममाली को देखकर, परोपकार और करुणा से भरे हुए महर्षि मार्कण्डेय ने उसे अपने पास बुलाया ।
महर्षि मार्कण्डेय ने अत्यंत मधुर और करुणापूर्ण वाणी में पूछा— 'हे मनुष्य! तुम कौन हो? तुम्हारी यह अत्यंत दयनीय और निंदनीय अवस्था कैसे हो गई? तुम्हारे शरीर को इस भयंकर कुष्ठ रोग ने कैसे ग्रसित कर लिया? तुमने ऐसा कौन सा महापाप किया है, जिसके कारण तुम्हें यह यातना भोगनी पड़ रही है?' ।
महर्षि के इन स्नेहपूर्ण वचनों को सुनकर हेममाली के नेत्रों से अश्रु बहने लगे। उसने हाथ जोड़कर, बिना कुछ छिपाए अत्यंत सत्यनिष्ठा के साथ उत्तर दिया— 'हे मुनिश्रेष्ठ! हे ऋषिवर! मैं धनपति कुबेर का सेवक हेममाली नामक यक्ष हूँ । मेरा कार्य प्रतिदिन मानसरोवर से भगवान शिव की पूजा के लिए पुष्प लाना था। एक दिन मैं पुष्प लेकर आया, किंतु अपनी रूपवती पत्नी के प्रेम और काम-वासना में अंधा होकर मैं समय पर पुष्प नहीं पहुँचा सका। इस कारण शिव-पूजा में विलंब हुआ और मेरे स्वामी राजा कुबेर ने क्रुद्ध होकर मुझे यह शाप दे दिया कि मैं कोढ़ी होकर अपनी पत्नी से बिछड़कर पृथ्वी पर भटकूँ । हे दयालु महर्षि! संतों का हृदय स्वभाव से ही करुणा से भरा होता है और उनका जन्म दूसरों के परोपकार के लिए ही होता है। मैं एक महान अपराधी हूँ, घोर कष्ट भोग रहा हूँ। मुझ पतित और असहाय पर कृपा करें और मेरे इस पाप तथा भयंकर रोग से मुक्ति का कोई उपाय बताएं।' ।
योगिनी एकादशी व्रत का उपदेश
"हे युधिष्ठिर! हेममाली के मुख से ऐसी निष्कपट और सत्य वाणी सुनकर महर्षि मार्कण्डेय अत्यंत प्रसन्न हुए। ऋषि ने कहा— 'हे यक्ष! तुमने मेरे समक्ष तनिक भी मिथ्या भाषण नहीं किया और अपना अपराध सत्य-सत्य स्वीकार किया है। सत्य बोलने से बड़े-बड़े पाप भी क्षीण हो जाते हैं। तुम्हारी इस सत्यवादिता से मैं प्रसन्न हूँ और इसलिए मैं तुम्हारे कल्याण और उद्धार के लिए एक अत्यंत गोपनीय और पुण्यप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ ।
हे हेममाली! तुम ध्यानपूर्वक सुनो। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में जो परम कल्याणकारी एकादशी आती है, उसे 'योगिनी एकादशी' कहते हैं । तुम इस योगिनी एकादशी का विधि-विधान पूर्वक उपवास करो। एकादशी के दिन पूर्ण रूप से निराहार रहकर भगवान श्रीहरि विष्णु का पूजन करो। हे यक्ष! इस योगिनी एकादशी व्रत के प्रभाव और पुण्य से तुम्हारा यह भयंकर कुष्ठ रोग निश्चय ही जड़ से नष्ट हो जाएगा। तुम्हें शाप से पूर्ण मुक्ति मिलेगी और तुम पुनः अपने दिव्य यक्ष स्वरूप को प्राप्त कर अपनी प्रियतमा के पास लौट जाओगे।' ।
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन, रोग-निवारण और पूर्वरूप की प्राप्ति
भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं— "हे धर्मराज! महर्षि मार्कण्डेय के श्रीमुख से इस महान एकादशी का उपदेश सुनकर हेममाली अत्यंत कृतार्थ हुआ। उसने महर्षि के चरणों में गिरकर बारंबार वंदना की । जब आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का शुभ दिन आया, तो महर्षि के बताए हुए विधान के अनुसार, हेममाली ने पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और नियम के साथ उस योगिनी एकादशी का कठिन उपवास किया । उसने निराहार रहकर भगवान श्रीहरि की आराधना की。
हे नृपश्रेष्ठ! इस परम पावन योगिनी एकादशी व्रत के अमोघ प्रभाव से एक अद्भुत चमत्कार हुआ। व्रत के पुण्य से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उनके आशीर्वाद से हेममाली का वह भयंकर और घृणित श्वेत कुष्ठ रोग उसी क्षण समाप्त हो गया । उसके शरीर की मलिनता और व्याधियाँ जड़ से नष्ट हो गईं। देखते ही देखते उसने अपना पूर्ववत, अत्यंत सुंदर, कांतिमय और दिव्य यक्ष स्वरूप पुनः प्राप्त कर लिया。
शाप से पूर्णतः मुक्त होकर, हेममाली महर्षि मार्कण्डेय को प्रणाम कर स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान कर गया। अलकापुरी पहुँचकर उसने पुनः अपनी प्रियतमा पत्नी को प्राप्त किया और राजा कुबेर के क्रोध से मुक्त होकर वह अत्यंत सुखी जीवन व्यतीत करने लगा।" ।
द्वितीय पाठ: स्कन्द पुराण एवं अन्य पारंपरिक ग्रंथों में वर्णित कथा का स्वरूप
एकादशी व्रत-कथा की सुदीर्घ सनातन परंपरा में, विभिन्न पौराणिक ग्रंथों के अनुसार कथा के कुछ भिन्न स्वरूप भी प्राप्त होते हैं। यद्यपि मूल कथा का सार, पात्रों का अपराध और उपदेश पूर्णतः समान है, तथापि 'स्कन्द पुराण' तथा कुछ अन्य पारंपरिक एकादशी व्रत-कथा ग्रंथों में इस प्रसंग के नाम और स्थान-विशेष में कुछ भिन्नता पाई जाती है । एकादशी व्रत के संपूर्ण और प्रामाणिक पालन हेतु, कथा-वाचन के समय इन पारंपरिक भेदों का उल्लेख करना अनिवार्य माना गया है, ताकि व्रती को समस्त पुराणों का पुण्य प्राप्त हो सके ।
पात्रों के नाम और स्थान का भेद
स्कन्द पुराण और तत्संबंधित पारंपरिक कथा ग्रंथों में राजा कुबेर और यक्ष हेममाली का प्रसंग उसी रूप में आता है, किंतु यहाँ हेममाली की अत्यंत रूपवती पत्नी का नाम 'विशालाक्षी' बताया गया है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण में यह नाम स्वरूपवती है)। स्कन्द पुराण के अनुसार, विशालाक्षी का रूप इतना सम्मोहक था कि हेममाली अपने कर्त्तव्य पथ से पूर्णतः विचलित हो गया था。
इसी प्रकार, जब कुबेर के शाप से हेममाली कुष्ठ रोगी होकर स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरता है, तो स्कन्द पुराण के अनुसार वह दर-दर भटकता हुआ हिमालय की सामान्य पर्वत-श्रृंखलाओं में नहीं, अपितु पुराण-प्रसिद्ध 'मेरु पर्वत' के दिव्य शिखर पर पहुँचता है । मेरु पर्वत, जो देवों और सिद्ध ऋषियों की परम तपःस्थली है, वहाँ उसकी भेंट त्रिकालदर्शी महर्षि मार्कण्डेय से होती है ।
पापों की गंभीरता और व्रत का महा-प्रभाव
स्कन्द पुराण की कथा में योगिनी एकादशी के माहात्म्य को और अधिक विस्तार देते हुए इसके प्रभाव का अत्यंत गंभीर वर्णन किया गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार, जब हेममाली अपना अपराध स्वीकार करता है, तब महर्षि मार्कण्डेय उसे समझाते हैं कि देव-पूजा में कामासक्ति के कारण विघ्न डालना कोई साधारण अपराध नहीं है, यह महा-पाप की श्रेणी में आता है ।
स्कन्द पुराण यह उद्घोष करता है कि 'योगिनी एकादशी' का यह व्रत इतना परम प्रभावशाली है कि यह केवल कुष्ठ रोग जैसे भयंकर शारीरिक दंड को ही नहीं मिटाता, अपितु यह मनुष्य के उन घोर संचित पापों को नष्ट कर देता है जो उसने अनजाने में या कई पूर्व जन्मों में किए हों । यहाँ तक कि यदि किसी मनुष्य से 'ब्रह्म-हत्या' (ब्राह्मण की हत्या) जैसा सर्वनाशकारी और अक्षम्य महापाप भी हो गया हो, तो पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष की इस योगिनी एकादशी का व्रत करने से वह भी उस महापाप के प्रभाव से मुक्त हो सकता है । यह व्रत पितरों को मोक्ष प्रदान करने वाला और जन्म-मृत्यु के कठोर बंधन को छिन्न-भिन्न करने वाला माना गया है ।
मेरु पर्वत पर महर्षि के उपदेशानुसार, यक्ष हेममाली आषाढ़ कृष्ण एकादशी का व्रत करता है और स्कन्द पुराण के वचनानुसार, वह अपने समस्त शारीरिक रोगों (जिसमें अठारह प्रकार के कुष्ठ रोगों का उल्लेख आता है) से तत्काल मुक्त होकर एक दिव्य शरीर धारण कर लेता है । अंततः वह विशालाक्षी के पास अलकापुरी लौट जाता है और भगवान विष्णु की असीम कृपा से अखंड सुख भोगता है ।
कथा के मुख्य बिंदु
| कथा के बिंदु | ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार | स्कन्द पुराण के अनुसार |
|---|---|---|
| यक्ष की पत्नी का नाम | स्वरूपवती | विशालाक्षी |
| ऋषि से भेंट का स्थान | हिमालय पर्वत | मेरु पर्वत |
| पाप-मुक्ति का विशेष उल्लेख | शिव-पूजा में विघ्न और कामुकता का पाप | ब्रह्म-हत्या जैसे महापापों से भी मुक्ति |
| रोग-मुक्ति का विस्तार | श्वेत कुष्ठ रोग से मुक्ति | 8 प्रकार के कुष्ठ रोगों से मुक्ति |
पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
(कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को इस व्रत का चरम फल बताते हैं। एकादशी व्रत की परंपरा में यह 'फलश्रुति' कथा का सबसे अनिवार्य अंग है, जिसके बिना कथा का पठन या श्रवण पूर्ण नहीं माना जाता है।)
कथा का समापन करते हुए कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा— "हे राजन! हे कुरुनंदन! तुमने स्वयं देखा और सुना कि यह योगिनी एकादशी कैसी चमत्कारी, दुख-नाशिनी और महापापों को शांत करने वाली है । महर्षि मार्कण्डेय के उपदेश मात्र से और इस व्रत के पालन से एक महापापी और कुष्ठ रोगी यक्ष पुनः अपने दिव्य रूप को प्राप्त कर सका。
हे युधिष्ठिर! यह योगिनी एकादशी महान पुण्य फल देने वाली है। जो मनुष्य 88,000 (अठासी हजार) विद्वान और सदाचारी ब्राह्मणों को आदर सहित मिष्ठान और उत्तम भोजन कराकर उन्हें संतुष्ट करता है, उस महादान से जो महान पुण्य फल प्राप्त होता है, वह संपूर्ण पुण्य फल केवल एक बार पूर्ण श्रद्धा और नियम-निष्ठा के साथ इस 'योगिनी एकादशी' का उपवास करने मात्र से अनायास ही प्राप्त हो जाता है । यह व्रत मानव जीवन को परम लक्ष्य तक ले जाने वाला एक अमोघ साधन है。
अतः हे धर्मराज! प्रत्येक मनुष्य को, जो अपने पापों से मुक्ति, शारीरिक रोगों से निवारण और अंत में भगवान के परम धाम की प्राप्ति चाहता है, उसे इस पावन व्रत का अवश्य पालन करना चाहिए。
पारंपरिक फल-वचन: जो मनुष्य पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ इस योगिनी एकादशी का व्रत करता है, और जो मनुष्य इस दिन एकाग्रचित्त होकर इस परम पावन पारंपरिक कथा को पढ़ता है या दूसरों के मुख से इस कथा का श्रवण करता है, वह इस लोक के समस्त महापापों से सर्वथा मुक्त हो जाता है। वह इस संसार में आरोग्य, सुख, ऐश्वर्य और शांति का उपभोग करता है, और अंतकाल में यमदूतों की यातना से बचकर, सीधे भगवान श्रीहरि विष्णु के परम धाम (वैकुंठ) को प्राप्त होता है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।
॥ इस प्रकार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी के माहात्म्य की यह परम पावन व्रत-कथा संपूर्ण हुई ॥
॥ बोलिए श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की जय ॥
॥ बोलिए उमापति महादेव की जय ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥