विस्तृत उत्तर
श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित सबसे पवित्र महीना है, और इस पूरे माह सात्विक आहार और संयम का विशेष महत्व है। शास्त्रों में, विशेषकर स्कंद पुराण और लिंग पुराण में, श्रावण मास में तामसिक भोजन से परहेज की स्पष्ट आज्ञा है।
मांसाहार पूर्णतः वर्जित है — स्कंद पुराण के अनुसार जो व्यक्ति श्रावण में मांस का सेवन करता है, वह अपने पुण्य को स्वयं नष्ट करता है। इसके पीछे धार्मिक कारण यह है कि श्रावण में शिवजी माता पार्वती के साथ ध्यान में रहते हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की जीव हिंसा से बचना आवश्यक माना गया है।
हरी पत्तेदार सब्जियाँ जैसे पालक, मेथी, बथुआ, लाल भाजी, गोभी और पत्ता गोभी इस मास में वर्जित मानी जाती हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है — सुश्रुत संहिता के अनुसार मानसून में ये सब्जियाँ कीटाणुओं से संक्रमित हो जाती हैं। प्राचीन कहावत भी इसी ओर संकेत करती है: 'सावन साग न भादों दही।'
प्याज और लहसुन तामसिक श्रेणी में आते हैं — ये मन को विचलित करते हैं और आध्यात्मिक साधना में बाधा बनते हैं, इसलिए श्रावण में इनसे परहेज करना उचित है। बैंगन को भी तामसिक माना गया है।
दही, कढ़ी, और कच्चा दूध — मानसून में पशुओं का चारा कीटाणुयुक्त होने से दूध की शुद्धता प्रभावित हो सकती है, इसलिए इनसे परहेज की सलाह दी जाती है। व्रत में साधारण नमक की जगह सेंधा नमक उपयुक्त माना गया है। अत्यधिक मीठी वस्तुएँ, गुड़, और शहद का भी संयम रखना चाहिए।
इसके अतिरिक्त तंबाकू, मदिरा और अन्य नशीले पदार्थ पूर्णतः वर्जित हैं। चातुर्मास में जिस प्रकार श्रावण में पत्तेदार साग छोड़ा जाता है, उसी क्रम में भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, और कार्तिक में प्याज-लहसुन त्यागे जाते हैं — यह क्रम शरीर और आत्मा, दोनों की शुद्धि के लिए है।





