विस्तृत उत्तर
हरिशयनी एकादशी (देवशयनी एकादशी) आषाढ़ शुक्ल एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में जाते हैं। यहाँ से चातुर्मास (4 माह) आरम्भ होता है।
विशेष महत्व
- ▸इस दिन से विष्णु शयन और चातुर्मास आरम्भ — विवाह, गृह प्रवेश आदि शुभ कार्य चार माह तक वर्जित।
- ▸प्रबोधिनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल) तक भगवान सोते रहते हैं।
- ▸यह एकादशी पुराणों में 'पद्मा' एकादशी भी कहलाती है।
विष्णु पूजा विधि
- 1प्रातः स्नान-संकल्प: 'हरिशयनी एकादशी व्रतं करिष्ये, चातुर्मास व्रतमारभे।'
- 1विष्णु शयन सज्जा: भगवान विष्णु की प्रतिमा/शालिग्राम को शय्या (छोटा पलंग/आसन) पर शयन मुद्रा में रखें। शेषनाग पर शयन का दृश्य सजाएँ।
- 1षोडशोपचार पूजन: पंचामृत अभिषेक, पीले वस्त्र, तुलसी, पीले पुष्प, चन्दन, नैवेद्य (खीर, फल)।
- 1मंत्र जप: 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' — 1008 बार। 'सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम्।'
- 1विष्णु सहस्रनाम/श्री सूक्त पाठ।
- 1चातुर्मास संकल्प: इस दिन चातुर्मास व्रत का संकल्प लें — शाक व्रत, दधि व्रत, क्षीर व्रत या अन्य नियम।
- 1दान: पीले वस्त्र, फल, अन्न, दक्षिणा।
विशेष: हरिशयनी एकादशी से प्रबोधिनी एकादशी तक विशेष तप-व्रत-साधना का काल है। इन चार माह में संन्यासी एक स्थान पर रहते हैं (चातुर्मास)।





