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वाहन पूजा विधि: नई गाड़ी की पूजा कैसे करें — संपूर्ण सामग्री एवं मंत्र
Katha

वाहन पूजा विधि: नई गाड़ी की पूजा कैसे करें

📿 पौराणिक•13 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 27 मार्च 2026
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नई गाड़ी, बाइक या वाहन खरीदने पर पूजा की संपूर्ण विधि हिंदी में — वाहन पूजा सामग्री, पूजन मंत्र, शुभ मुहूर्त एवं दुर्घटना निवारण अनुष्ठान।

ज्ञान-सार

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वाहन-पूजन: नई वाहन प्राप्ति पर किए जाने वाले पूजन की शास्त्रसम्मत एवं अनुष्ठानिक विधि का शोधपरक विश्लेषण

सनातन धर्म की परंपरा में जड़ और चेतन के मध्य भेद को मिटाकर प्रत्येक वस्तु में दैवीय चेतना के दर्शन करने का विधान है। वाहन, जो प्राचीन काल में रथ, अश्व और गज के रूप में पुरुषार्थ और ऐश्वर्य का प्रतीक था, आधुनिक युग में यंत्र चालित यानों के रूप में हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। नई वाहन प्राप्ति पर किया जाने वाला पूजन केवल एक औपचारिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह वाहन की यांत्रिक शक्ति को दैवीय सुरक्षात्मक ऊर्जा के साथ समन्वित करने का एक शास्त्रीय अनुष्ठान है । 'वाहन' शब्द की व्युत्पत्ति 'वह' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है 'ढोना' या 'ले जाना'। जीवन की यात्रा को निर्विघ्न, सुरक्षित और समृद्ध बनाने के लिए वाहन के अधिष्ठात्री देवताओं का आवाहन और पूजन अनिवार्य माना गया है । प्रस्तुत शोध लेख में वाहन-पूजन की शास्त्रीय विधि, मुहूर्त विज्ञान, मंत्रों के गूढ़ अर्थ और इसके पीछे निहित दार्शनिक मान्यताओं का विस्तृत विवेचन किया गया है।

वाहन-पूजन का दार्शनिक एवं शास्त्रीय आधार

भारतीय मनीषा ने सदैव यंत्रों को केवल निर्जीव धातु के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति के अधिष्ठान के रूप में देखा है। मत्स्य पुराण और भविष्य पुराण जैसे ग्रंथों में वाहनों (विशेषकर रथों) की प्रतिष्ठा को एक महादान और महायज्ञ के समान माना गया है । शास्त्रीय दृष्टिकोण से वाहन को 'लक्ष्मी' का स्वरूप माना जाता है, क्योंकि यह गति और ऐश्वर्य प्रदान करता है । पूजन की इस प्रक्रिया में 'प्राण प्रतिष्ठा' के सूक्ष्म तत्वों का समावेश होता है, जहाँ यान के विभिन्न अंगों में विभिन्न शक्तियों का आवाहन किया जाता है ।

वाहन-पूजन का मुख्य उद्देश्य 'त्रिविध तापों' और 'अरिष्टों' का शमन करना है। यात्रा के दौरान आने वाले संभावित व्यवधान, नजर दोष और यांत्रिक विफलताओं को आध्यात्मिक ऊर्जा के माध्यम से नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है । निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु जैसे ग्रंथों में 'आयुध पूजा' (यंत्रों और अस्त्रों की पूजा) के जो विधान बताए गए हैं, वे ही आधुनिक वाहन-पूजन के मूल आधार हैं । इसमें वाहन को एक 'रथ' मानकर उसके रक्षक देवताओं की प्रार्थना की जाती है。

शुभ मुहूर्त निर्धारण के ज्योतिषीय एवं शास्त्रीय नियम

किसी भी शुभ कार्य की सफलता उसके प्रारंभ के समय पर निर्भर करती है। वाहन-पूजन और वाहन के प्रथम संचालन के लिए 'मुहूर्त' का चयन ज्योतिष शास्त्र के जटिल सिद्धांतों पर आधारित है। वाहन क्रय करने और उसका पूजन करने के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, योग और लग्न का सामंजस्य आवश्यक है ।

प्रशस्त तिथियाँ और वार

वाहन क्रय और पूजन के लिए शुक्ल पक्ष की तिथियाँ अत्यंत प्रभावी मानी जाती हैं। निर्णय सिंधु के अनुसार, प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक की तिथियों में ऊर्जा का सकारात्मक संचार होता है, परंतु 'रिक्ता' तिथियों (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) को टालना चाहिए ।

श्रेणी शुभ विकल्प शास्त्रीय महत्ता
शुभ वार सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार ये वार क्रमशः चंद्रमा (शांति), बुध (बुद्धि), गुरु (सुरक्षा) और शुक्र (सुख) के प्रतीक हैं ।
शुभ तिथियाँ १, ३, ५, ६, ८, १०, ११, १३, १५ ये तिथियाँ कार्य में स्थिरता और वृद्धि प्रदान करती हैं ।
त्याज्य तिथियाँ अमावस्या, ४, ९, १४ अमावस्या और रिक्ता तिथियाँ मानसिक अस्थिरता और अवरोध उत्पन्न कर सकती हैं ।

नक्षत्र और लग्न विचार

वाहन एक गतिशील वस्तु है, अतः ज्योतिष शास्त्र में इसके लिए 'चर' (Chara) और 'मृदु' (Mridu) नक्षत्रों को प्राथमिकता दी गई है। पुनर्वसु, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा को चल नक्षत्र कहा गया है, जो लंबी और सुरक्षित यात्राओं के लिए उपयुक्त हैं । इसके अतिरिक्त हस्त, पुष्य, अश्विनी और रेवती नक्षत्रों में वाहन पूजन करने से वाहन की आयु बढ़ती है और वह स्वामी के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है ।

मुहूर्त निकालते समय 'राहुकाल' का त्याग अनिवार्य है। धर्मसिंधु के अनुसार, राहुकाल में किया गया कोई भी शुभ कार्य भविष्य में 'अरिष्ट' (अनिष्ट) का कारण बन सकता है । इसके साथ ही 'भद्रा' और 'पंचक' दोषों का भी विचार किया जाना चाहिए, विशेषकर जब वाहन लोहे से निर्मित हो ।

अनुष्ठानिक तैयारी और पूजन सामग्री का आध्यात्मिक महत्व

वाहन-पूजन की प्रक्रिया जितनी बाह्य है, उतनी ही आंतरिक चेतना से भी जुड़ी है। पूजन के लिए उपयोग की जाने वाली प्रत्येक सामग्री का अपना विशिष्ट आध्यात्मिक और ऊर्जावान महत्व है。

  • गंगाजल और पंचपल्लव: शुद्धि का प्राथमिक माध्यम गंगाजल है। यह वाहन की भौतिक अशुद्धियों के साथ-साथ सूक्ष्म नकारात्मकता का भी निवारण करता है ।
  • रोली (कुंकुम), हल्दी और सिंदूर: स्वस्तिक और तिलक के लिए इनका प्रयोग होता है। लाल रंग ऊर्जा और शौर्य का प्रतीक है, जबकि हल्दी मंगलकारिणी और आरोग्य प्रदायिनी है ।
  • मौली (रक्षासूत्र): यह त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की शक्ति का धागा है, जो वाहन के मुख्य अंगों पर रक्षा कवच का कार्य करता है ।
  • नारियल (श्रीफल): इसे लक्ष्मी का स्वरूप और 'बलि' का सात्विक विकल्प माना जाता है। यह अहंकार के विसर्जन और शुभता के आगमन का प्रतीक है ।
  • नींबू (चार संख्या): नींबू को तांत्रिक और पौराणिक दृष्टि से नकारात्मक शक्तियों को अवशोषित करने वाला माना गया है। इन्हें पहियों के नीचे रखना मार्ग की बाधाओं के शमन का प्रतीक है ।
  • पीली सरसों: इसे 'भूत-नाशक' माना गया है। वाहन के भीतर इसे छिड़कने से अदृश्य बाधाएं दूर होती हैं ।

चरणबद्ध वाहन-पूजन विधि: एक विस्तृत अनुष्ठान

वाहन-पूजन की विधि को निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु के सिद्धांतों के अनुसार निम्नलिखित चरणों में संपन्न किया जाना चाहिए। यह प्रक्रिया केवल यांत्रिक नहीं, बल्कि पूर्णतः मंत्रोच्चार और भावना प्रधान होनी चाहिए ।

१. आत्म-शुद्धि और पवित्रीकरण

पूजन का प्रारंभ स्वयं की शुद्धि से होता है। हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करना चाहिए और 'पुंडरीकाक्ष' का स्मरण करना चाहिए。

मंत्र: ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

इस मंत्र का अर्थ है कि भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से व्यक्ति और वस्तु दोनों पवित्र हो जाते हैं। इसके पश्चात वाहन पर गंगाजल का छिड़काव करना चाहिए ।

२. संकल्प-विधि (Desh-Kaal Sankalpa)

किसी भी वैदिक कर्म में संकल्प सबसे महत्वपूर्ण है। संकल्प के बिना कर्म का फल प्राप्त नहीं होता। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर वर्तमान समय (युग, मन्वंतर, संवत), स्थान (भारतवर्ष, प्रदेश) और अपने कुल (गोत्र, नाम) का उच्चारण करते हुए वाहन सुरक्षा और सुख के लिए प्रतिज्ञा करनी चाहिए ।

संकल्प का प्रारूप: "मम नूतन वाहनस्य दीर्घायुष्य-आरोग्य-क्षेम-स्थैर्य-प्राप्त्यर्थं श्री महागणपति-विशुद्ध-चक्र-रक्षक-देवतानां पूजनं करिष्ये।"

३. स्वस्तिक अंकन और यंत्र-प्रतिष्ठा

वाहन के अग्र भाग (बोनट) पर रोली और सिंदूर से स्वस्तिक बनाना चाहिए। स्वस्तिक की चार भुजाएं चारों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं और केंद्र बिंदु 'ब्रह्म' का प्रतीक है । स्वस्तिक के चारों ओर चार बिंदु 'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष' के प्रतीक हैं। स्वस्तिक के ऊपर 'ॐ' और दाएं-बाएं 'शुभ-लाभ' या 'श्री' लिखना यांत्रिक चेतना को जाग्रत करता है ।

४. देवताओं का आवाहन और अधिष्ठान

वाहन के विभिन्न अंगों में विशिष्ट देवताओं का आवाहन किया जाता है। मत्स्य पुराण के रथ-प्रतिष्ठा प्रकरण के अनुसार, वाहन के प्रत्येक भाग में सुरक्षा शक्तियों का वास होता है ।

वाहन का अंग अधिष्ठात्री शक्ति प्रयोजन
पहिये (टायर) महाकाली और भैरव मार्ग की बाधाओं और दुर्घटनाओं का संहार ।
इंजन (यंत्र) महालक्ष्मी और अग्नि शक्ति, वेग और निरंतरता की प्राप्ति ।
स्टीयरिंग / सीट महासरस्वती और बुद्धि चालक की एकाग्रता और सही निर्णय क्षमता ।
प्रकाश (लाइट्स) सूर्य और अग्नि अज्ञान और अंधकार का नाश, मार्ग दर्शन ।

इन शक्तियों का ध्यान दुर्गा सप्तशती के ध्यान मंत्रों द्वारा किया जाना चाहिए ।

५. षोडशोपचार पूजन

देवताओं के आवाहन के पश्चात वाहन का पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इसमें गंध (चंदन), अक्षत (चावल), पुष्प, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं । विशेष रूप से 'अष्ट-दिक्पालों' (दसों दिशाओं के रक्षक) को अक्षत और पुष्प अर्पित कर उनसे सुरक्षा की प्रार्थना की जाती है ।

६. नैवेद्य और मधुर भोग

वाहन पर दही और गुड़ का भोग लगाया जाता है। दही शीतलता और गुड़ मिठास (सकारात्मकता) का प्रतीक है । कुछ स्थानों पर मिठाई या नारियल का प्रसाद भी वाहन के डैशबोर्ड पर रखा जाता है, जिसे बाद में गौ-ग्रास के रूप में दिया जाता है ।

७. रक्षा सूत्र (मौली) बंधन

वाहन के मुख्य संचालन केंद्र (स्टीयरिंग) और पीछे देखने वाले दर्पण (Mirror) पर रक्षा सूत्र बांधा जाता है। यह धागा वाहन को 'बंधन' (अनुशासन) और सुरक्षा प्रदान करता है ।

नारियल फोड़ने का शास्त्रीय एवं तार्किक आधार

वाहन-पूजन में 'श्रीफल' या नारियल फोड़ना सबसे लोकप्रिय किंतु गंभीर शास्त्रीय क्रिया है। इसके पीछे के कारणों को समझना अनिवार्य है:

  • अहंकार का विसर्जन: नारियल का कठोर आवरण मनुष्य के कठोर अहंकार (Ego) का प्रतीक है। इसे फोड़ने का अर्थ है कि स्वामी ने अपने अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दिया है और अब वह केवल एक 'सारथी' मात्र है ।
  • सात्विक बलि: प्राचीन काल में वाहनों की रक्षा हेतु पशु-बलि दी जाती थी। कालान्तर में ऋषियों ने इसे 'नारियल' के रूप में सात्विक बलि में परिवर्तित कर दिया। यह 'बली' मार्ग की बाधाओं को शांत करने के लिए दी जाती है ।
  • नकारात्मक ऊर्जा का निष्कासन: ऐसी मान्यता है कि नारियल फोड़ने से निकलने वाली ध्वनि तरंगें सूक्ष्म नकारात्मक ऊर्जाओं को विखंडित कर देती हैं। नारियल का जल छिड़कने से वातावरण में शुद्धि आती है ।

विधि: नारियल को वाहन के चारों ओर सात बार 'उतारा' करके वाहन के सामने भूमि पर फोड़ा जाता है। ध्यान रहे कि नारियल वाहन पर नहीं, बल्कि भूमि पर फोड़ा जाए ।

वाहन रक्षक मंत्र और उनके शास्त्रीय अर्थ

पूजन के दौरान मंत्रों का सस्वर पाठ वाहन की यांत्रिक ध्वनि को 'नाद ब्रह्म' में बदल देता है। यहाँ कुछ मुख्य मंत्रों का विवरण दिया गया है:

१. स्वस्ति मंत्र (ऋग्वेद)

यात्रा की सुरक्षा के लिए ऋग्वेद का यह मंत्र सर्वश्रेष्ठ है:

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

अर्थ: महान कीर्ति वाले इंद्र, सर्वज्ञ पूषा (सूर्य), जिनके चक्र की गति अटूट है ऐसे गरुड़ देव और बुद्धि के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें। यहाँ 'तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः' (गरुड़) का उल्लेख वाहन की गति और सुरक्षा के लिए अत्यंत प्रासंगिक है ।

२. हनुमान रक्षा मंत्र

अकस्मात दुर्घटनाओं से बचाव के लिए अंजनी पुत्र हनुमान का आवाहन किया जाता है:

ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।

हनुमान जी को 'संकटमोचन' कहा गया है, और वाहन पर उनकी उपस्थिति 'अभय' प्रदान करती है ।

३. नारायण कवच मंत्र

लंबी यात्राओं के लिए श्रीमद्भागवत के नारायण कवच का यह अंश अत्यंत प्रभावी है:

ॐ विष्णवे नमः (पञ्च बार जप)

यह मंत्र वाहन के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आभामंडल तैयार करता है, जिसे 'दिव्य कवच' माना गया है ।

४. महामृत्युंजय मंत्र

वाहन की प्रदक्षिणा करते समय महामृत्युंजय मंत्र का जप अकाल मृत्यु और गंभीर चोटों से रक्षा करता है:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

आरती और प्रदक्षिणा का विधान

पूजन के अंत में कर्पूर से आरती की जाती है। कर्पूर की अग्नि नकारात्मक ऊर्जा को जला देती है। आरती को वाहन के चारों ओर सात बार घुमाना चाहिए । आरती के पश्चात बचे हुए काजल (काजल जो दीपक के ऊपर जमा हो जाता है) से वाहन पर एक छोटा तिलक लगाना चाहिए, जो 'नजर दोष' से सुरक्षा करता है ।

प्रदक्षिणा (Circumambulation) के दौरान वाहन के चारों ओर 'घड़ी की सुई की दिशा' (Clockwise) में तीन या सात बार घूमना चाहिए। इस प्रक्रिया में हाथ में अक्षत लेकर मंत्रों का पाठ करते हुए वाहन को केंद्र मानकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा का चक्र बनाया जाता है ।

वाहन संचालन के पूर्व: नींबू और अन्य टोटके

जब पूजन पूर्ण हो जाए, तब वाहन को प्रथम बार चलाने से पहले निम्नलिखित क्रियाएं की जाती हैं:

  • नींबू विदारण: वाहन के चारों पहियों के नीचे एक-एक नींबू रखा जाता है । वाहन को जब आगे बढ़ाया जाता है और नींबू कटते हैं, तो यह मार्ग की समस्त आसुरी और विघ्नकारी शक्तियों के 'वध' का प्रतीक है ।
  • गौ-ग्रास: पूजन में चढ़ाए गए नैवेद्य को किसी गाय को खिलाना चाहिए। शास्त्रों में गाय में ३३ कोटि देवताओं का वास माना गया है, और उनका आशीर्वाद वाहन को 'अक्षय सुरक्षा' प्रदान करता है ।

नियम, निषेध और पावन आचरण (Do's and Don'ts)

वाहन-पूजन के पश्चात स्वामी के लिए कुछ नियमों का पालन अनिवार्य बताया गया है, ताकि पूजन का प्रभाव स्थायी रहे:

पक्ष नियम / आचरण शास्त्रीय कारण
नियम प्रथम यात्रा मंदिर की ओर । कृतज्ञता और दैवीय समर्पण।
नियम निरंतर स्वच्छता और पवित्रीकरण । जहाँ शुद्धि है, वहीं लक्ष्मी और ऊर्जा का वास है।
निषेध वाहन में मद्यपान या मांसाहार का सेवन । यह वाहन की सात्विक सुरक्षा कवच को भंग करता है।
निषेध क्रोध या अपशब्दों का प्रयोग करते हुए चालन । मानसिक विक्षोभ दुर्घटना का प्राथमिक कारण है।
नियम समय-समय पर 'विश्वकर्मा पूजा' करना । यांत्रिक स्थिरता और शिल्पी दोष का निवारण।

दान-विधान और पात्रता (Charity and Eligibility)

पूजन संपन्न होने पर आचार्य या किसी निर्धन व्यक्ति को दान देना अनुष्ठान की पूर्णता माना जाता है। मत्स्य पुराण के अनुसार, रथ-प्रतिष्ठा के बाद तिल, वस्त्र, गुड़ और दक्षिणा का दान करना चाहिए । वाहन के स्वामी की पात्रता के विषय में शास्त्रों का मत है कि वह व्यक्ति जो धर्मपूर्वक धन अर्जित करता है और अपने वाहन का उपयोग 'लोक-कल्याण' और 'स्व-धर्म' पालन के लिए करता है, उसी का वाहन पूजन सफल होता है ।

फल-श्रुति: पूजन का आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ

शास्त्रीय ग्रंथों में वाहन-पूजन के निम्नलिखित फल बताए गए हैं:

  • अरिष्ट निवारण: वाहन द्वारा होने वाली अकाल मृत्यु या बड़ी दुर्घटनाओं का टलना ।
  • स्थिरता और समृद्धि: वाहन का लंबे समय तक बिना बड़ी यांत्रिक खराबी के चलना और व्यवसाय में वृद्धि ।
  • मानसिक शांति: चालक के मन में सुरक्षा का भाव उत्पन्न होना, जिससे दुर्घटना की संभावना स्वतः कम हो जाती है ।
  • दैवीय कृपा: यात्रा के दौरान अदृश्य शक्तियों द्वारा सहायता प्राप्त होना ।

निष्कर्ष और समीक्षा

वाहन-पूजन की यह शास्त्रसम्मत विधि प्राचीन 'रथ-प्रतिष्ठा' और आधुनिक यांत्रिक विज्ञान का एक अनूठा संगम है। निर्णय सिंधु और पुराणों के प्रमाण स्पष्ट करते हैं कि यह प्रक्रिया केवल एक अंधविश्वास नहीं, बल्कि ध्वनि तरंगों (मंत्रों), प्रतीकों (स्वस्तिक, नारियल) और संकल्प शक्ति के माध्यम से यान को सुरक्षित करने का एक सूक्ष्म विज्ञान है। वाहन को केवल एक निर्जीव यंत्र न मानकर उसे अपनी जीवन-यात्रा का 'सहचर' मानना ही इस पूजन का वास्तविक मर्म है। अतः प्रत्येक नवीन वाहन स्वामी को चाहिए कि वह शास्त्रोक्त विधि से पूजन संपन्न कर, अपने और अपने परिवार की यात्रा को मंगलमय और सुरक्षित बनाए ।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

पूजन विधि

वाहन पूजन से पहले क्या करें?

पूजन से पहले: (1) तीन बार आचमन — 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वा...' मंत्र, (2) वाहन पर गंगाजल छिड़कें, (3) संकल्प लें — जल-अक्षत-पुष्प हाथ में लेकर गोत्र-नाम-स्थान उच्चारण करते हुए वाहन सुरक्षा की प्रतिज्ञा करें।

पूजन विधि

वाहन पूजन में क्या भोग लगाते हैं?

वाहन पूजन भोग: दही (शीतलता = शांत यात्रा) और गुड़ (मिठास = सकारात्मकता)। मिठाई या नारियल डैशबोर्ड पर रखें। पूजन के बाद नैवेद्य को गाय को खिलाएं (गौ-ग्रास) — 33 कोटि देवताओं का आशीर्वाद।

पूजन विधि

वाहन पूजन के बाद पहली यात्रा कहाँ जाएं?

वाहन पूजन के बाद पहली यात्रा = मंदिर। कारण: कृतज्ञता और दैवीय समर्पण। जिनकी कृपा से वाहन मिला, उन्हें प्रथम दर्शन देना शास्त्रीय नियम है।

पूजन विधि

वाहन पूजन में आरती कैसे करते हैं?

वाहन आरती: कर्पूर से 7 बार वाहन के चारों ओर घुमाएं। आरती के बाद दीपक का काजल वाहन पर लगाएं — यह 'नजर दोष' से सुरक्षा करता है।

वाहन पूजन परिचय

वाहन पूजन का क्या महत्व है?

मत्स्य पुराण और भविष्य पुराण: वाहन प्रतिष्ठा = महादान और महायज्ञ समान। निर्णय सिंधु: 'आयुध पूजा' के विधान ही आधुनिक वाहन पूजन का आधार। यह मंत्रों, स्वस्तिक और संकल्प शक्ति से यान को सुरक्षित करने का सूक्ष्म विज्ञान है।

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