विस्तृत उत्तर
भारतीय मनीषा ने सदैव यंत्रों को केवल निर्जीव धातु के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति के अधिष्ठान के रूप में देखा है। मत्स्य पुराण और भविष्य पुराण जैसे ग्रंथों में वाहनों (विशेषकर रथों) की प्रतिष्ठा को एक महादान और महायज्ञ के समान माना गया है।
निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु जैसे ग्रंथों में 'आयुध पूजा' (यंत्रों और अस्त्रों की पूजा) के जो विधान बताए गए हैं, वे ही आधुनिक वाहन-पूजन के मूल आधार हैं। इसमें वाहन को एक 'रथ' मानकर उसके रक्षक देवताओं की प्रार्थना की जाती है।
वाहन-पूजन की यह शास्त्रसम्मत विधि प्राचीन 'रथ-प्रतिष्ठा' और आधुनिक यांत्रिक विज्ञान का एक अनूठा संगम है। यह प्रक्रिया केवल एक अंधविश्वास नहीं, बल्कि ध्वनि तरंगों (मंत्रों), प्रतीकों (स्वस्तिक, नारियल) और संकल्प शक्ति के माध्यम से यान को सुरक्षित करने का एक सूक्ष्म विज्ञान है।





