विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म की परंपरा में जड़ और चेतन के मध्य भेद को मिटाकर प्रत्येक वस्तु में दैवीय चेतना के दर्शन करने का विधान है। नई वाहन प्राप्ति पर किया जाने वाला पूजन केवल एक औपचारिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह वाहन की यांत्रिक शक्ति को दैवीय सुरक्षात्मक ऊर्जा के साथ समन्वित करने का एक शास्त्रीय अनुष्ठान है।
शास्त्रीय दृष्टिकोण से वाहन को 'लक्ष्मी' का स्वरूप माना जाता है, क्योंकि यह गति और ऐश्वर्य प्रदान करता है। पूजन की इस प्रक्रिया में 'प्राण प्रतिष्ठा' के सूक्ष्म तत्वों का समावेश होता है, जहाँ यान के विभिन्न अंगों में विभिन्न शक्तियों का आवाहन किया जाता है।
वाहन-पूजन का मुख्य उद्देश्य 'त्रिविध तापों' और 'अरिष्टों' का शमन करना है। यात्रा के दौरान आने वाले संभावित व्यवधान, नजर दोष और यांत्रिक विफलताओं को आध्यात्मिक ऊर्जा के माध्यम से नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है। निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु जैसे ग्रंथों में 'आयुध पूजा' (यंत्रों और अस्त्रों की पूजा) के जो विधान बताए गए हैं, वे ही आधुनिक वाहन-पूजन के मूल आधार हैं।




