विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और सनातन शास्त्रों में मृत्यु के समय श्वास की स्थिति का वर्णन मिलता है। जब मृत्यु का क्षण निकट आता है, तो व्यक्ति की श्वास-क्रिया धीरे-धीरे अनियमित और कमजोर होने लगती है। पाँच प्राण — प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान — जो शरीर में जीवन-ऊर्जा का संचालन करते हैं, मृत्यु के समय एक-एक करके अपना कार्य बंद करने लगते हैं।
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इंद्रियों के शिथिल होने के साथ-साथ श्वास भी अनियमित हो जाती है। अंतिम क्षणों में श्वास बहुत छोटी और कष्टकारी हो जाती है। जब प्राण ऊपर की ओर उठते हैं (उदान वायु) — जो श्रेष्ठ कर्मियों में होता है — तो मृत्यु अपेक्षाकृत शांत होती है।
वेदांत परंपरा में भी यह बताया गया है कि मृत्यु के समय 'उदान वायु' प्राण को शरीर से ऊपर की ओर ले जाती है। योगशास्त्र में प्राणायाम का उद्देश्य इसी वायु को नियंत्रित करना है ताकि मृत्यु के समय शरीर त्याग सहज हो। जो साधक ब्रह्मरंध्र (सिर के शीर्ष) से प्राण छोड़ते हैं, उन्हें उत्तम गति प्राप्त होती है।





