विस्तृत उत्तर
इसी कारण से शास्त्रों में कहा गया है कि बिना धर्म और सत्कर्म के लक्ष्मी का स्थायित्व सर्वथा असंभव है।
मनुष्य के जीवन में धन या ऐश्वर्य का आगमन उसके शुभ कर्मों का परिणाम है, और यदि वह कर्म दूषित हो जाए, तो साक्षिणी के रूप में लक्ष्मी तत्काल उस स्थान से विमुख हो जाती हैं।
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, जब धन (लक्ष्मी) का प्रयोग धर्म (विष्णु) के बिना होता है, तो वह धन आसुरी संपत्ति बन जाता है, वह चंचला बन जाती है और अंततः मनुष्य के पतन का कारण बनती है।
लक्ष्मी का उद्भव क्षीरसागर (शुद्धता और मंथन) से होता है, परंतु वे वहीं स्थिर होती हैं जहाँ नारायण (धर्म, पालन और सत्य) विद्यमान होते हैं। धन का धर्म के बिना कोई स्वतंत्र अस्तित्व या स्थायित्व नहीं है।




