विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म और वैदिक वांग्मय में 'श्री' और 'लक्ष्मी' को मात्र भौतिक धन, मुद्राओं या लौकिक सम्पदा की प्रतीक नहीं माना गया है, अपितु वे संपूर्ण चराचर जगत के पोषण, संतुलन, ऐश्वर्य, सौंदर्य, आंतरिक चेतना और मोक्ष की सर्वोच्च अधिष्ठात्री महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
ऋग्वेद के परिशिष्ट 'श्रीसूक्त' से लेकर उपनिषदों की आध्यात्मिक गहराई और विष्णु पुराण, भागवत पुराण तथा पद्म पुराण के विस्तृत आख्यानों तक, माँ लक्ष्मी का स्वरूप अत्यंत व्यापक, दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण है।
वेदों, उपनिषदों, विष्णु पुराण, भागवत पुराण और पद्म पुराण के गहन विश्लेषण से यह अकाट्य सत्य उद्घाटित होता है कि वे मात्र भौतिक विनिमय (मुद्रा/धन) की देवी नहीं हैं। वे चराचर जगत की वह 'श्री' हैं — वह अनिर्वचनीय सौंदर्य, वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा और वह धर्म-आधारित समृद्धि हैं, जो मानव जीवन को पूर्णता और मोक्ष की ओर ले जाती हैं।





