जितेन्द्रिय व्यक्ति कैसा होता है का सबसे सीधा सार यह है: जो इन्द्रिय-विषयों या ऐश्वर्यों की अप्राप्ति पर क्रोध नहीं करता और प्राप्ति पर हर्षित नहीं होता, वह जितात्मा है।
साधु और संत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 57, श्लोक 5 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।
इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।
•उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 57, श्लोक 5 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।
•साधु और संत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।
•यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।