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विस्तृत उत्तर
आचार्य वृद्ध, निलोभी, जितेन्द्रिय, दम्भ न करने वाला, पूर्ण विनम्र और सरल स्वभाव वाला होना चाहिए। पाठ में ऐसे लोगों को आचार्य कहा गया है। यहाँ आचार्यत्व केवल विद्या या पद से नहीं, बल्कि संयम, लोभरहितता, विनय और सरलता से जुड़ा है। इसलिए आचार्य वह है जो अपने आचरण और स्वभाव से धर्म का आदर्श बन सके।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 58, श्लोक 14
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