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विस्तृत उत्तर
पंच महायज्ञ के रूप में ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, दैवयज्ञ, भूतयज्ञ और नृयज्ञ बताए गए हैं। इनके प्रभाव और इन्हें करने की विधि का वर्णन भी लिङ्गपुराण के विषयों में कहा गया है। इसी क्रम में नान्दीश्राद्ध, वेदाध्ययन, आचार-विचार, भोज्य-अभोज्य और प्रायश्चित्त जैसे विषयों का भी उल्लेख आता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 2, PDF पृष्ठ 18, श्लोक 32-34
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