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विस्तृत उत्तर
पशु और पाश का अर्थ पाशुपत तत्त्व से जुड़े विषय में आता है। पशु को जीव और पाश को बन्धन बताकर उनकी मीमांसा का उल्लेख किया गया है। इसी क्रम में आसक्ति के स्वरूप का ज्ञान और निवृत्ति की योग्यता प्राप्ति भी वर्णित विषयों में रखी गई है। इसलिए यहाँ पशु-पाश का प्रसंग जीव, बन्धन, आसक्ति और निवृत्ति से जुड़ा हुआ बताया गया है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 2, PDF पृष्ठ 17-18, श्लोक 25-27
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